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चुनावी नांव में हिचकोले खा रहे है राजस्थान की जनता के मुद्दे

नागौर में खरनाल के अलावा अगर कही वसुंधरा राजे जाट राणी होने के खटके दिखाने में विश्वास रखती है तो वो जगह है  – ओसियां। भोपालगढ़ के रिजर्व हो जाने के बाद मारवाड़ की जाट राजनीति का केन्द्र ओसियां है। आधे से ज्यादा खाली मैदान और ड़ूबते राजनीतिक सितारे का अहसास वसुंधरा राजे को पहले से ही झकझोर रहा था और रही सही कसर एक ग्रामीण महिला के तंज ने पूरी कर दी। महिला ने मुख्यमंत्री से ये कहा कि आपको वोट क्यो दे, आपके राज में पढ़े लिखे नौजवान बेरोजगारी के कारण घर बैठे है। राजस्थान के मुद्दों से भागती वसुंधरा राजे को अपने राजनीतिक ताबूत की आखिरी कील लग ही गई वो भी वहां जहां उन्हे ऐसी उम्मीद ना थी। या फिर ये कहे, कि वसुंधरा राजे का जहाज वहां ड़ूबा जहां पानी कम था।

राजस्थान के विधानसभा चुनावों में आम आदमी के मुद्दे गौण हो चले है। अशोक गहलोत के अलावा ऐसा कोई भी भाजपा या कांग्रेस का नेता नही है जिसने आम आदमी के मुद्दों पर फोकस करने की कोशिश की हो। राजस्थान में आम आदमी वसुंधरा राजे के राज में भ्रष्टाचार से त्रस्त रहा। भाजपा विधायकों ने जम कर लूट पाट की पर फिर भी सब कुछ जानते हुए भी, वसुंधरा राजे ने उन्हे वापस मैदान में उतार दिया। कारण, बताने की जरुरत नही, सब जानते ही है।

अपनी उपलब्धियों के नाम पर वसुंधरा राजे गिनाती है कि उन्होने शिक्षा के क्षेत्र में राजस्थान में आमूलचूल परिवर्तन किये है। पर, सरकार की तकदीर बनाने और बिगाड़ने वाली मास्टर कौम इससे सहमत नही है। मॉड़ल स्कूल का मॉड़ल सफल नही हो पाया और ट्रांसफर पोस्टिंग में हुई मनमानी और बंदरबांट के उदाहरण सभी की जेब में पड़े है। गौरव पथ जरुर एक सफल योजना साबित हुई पर इसका आइड़िया भी वसुंधरा राजे को एक रजवाड़े के दरबारी ने दिया था। मेड़िकल कॉलेजों की जो दास्तान आजकल राजनीतिक मंचों से सुनाई जा रही है उसका जवाब देने का पूरा अधिकार श्रीगंगानगर या फिर चुरु को है। पिछले एक साल से बजरी बंद होने से माफिया की चांदी है और उसके भागीदारों – पुलिस, परिवहन विभाग की अंगुलियां घी में और सर कड़ाई में।

भामाशाह योजना में हुए भ्रष्टाचार की कहानी अन्नत है। आम आदमी के नाम पर सरकारी पैसे की लूट का इतना संस्थानिक प्रकल्प राजस्थान में पहले कभी नही था। खासबात ये कि सूचना के अधिकार की गला घोंट कर हत्या उसी राज्य में कर दी गई जहां उसका जन्म हुआ था। ऐसे में राजशाही के दिनों की याद वापस ताजा हो गयी जब शासन करने वाला ही माई-बाप होता था।

कांग्रेस ने भी राजस्थान को मुद्दों को ढंग से नही उठाया। किसी ने ये नही पूछा कि जयपुर और अजमेर में पीने के पानी के लिए आपकी क्या योजना है। बीसलपुर बांध कब तक रोज बढ़ते बोझ को झेल पायेगा। अन्नपूर्णा योजना को तहत सस्ते भोजन को बार बार एक सफल योजना बताया जाता है पर किसी ने ये नही पूछा कि हाड़ौती के एक नेता को पूरे राज्य में इस योजना का ठेका कैसे मिला। और, अगर उन्हे ठेका मिला है तो साफ है, बंदरबांट की रेट पहले से तय है।

केबीनेट में सर्कुलेशन से फैसले लेना, चुनिन्दा अधिकारियों और पुराने सिपहसालारों के भरोसे सिस्टम चलाने के तरीके ने राजस्थान में राजशाही के तौर तरीकों को फिर से मेन स्ट्रीम मे ला दिया। खासबात ये कि इस बार सांमतशाही में भागीदारी उन कुछ किसान पुत्रों की थी जिनके पुरखो ने सांमतशाही के खिलाफ लंबी जंग लड़ी थी। कानून व्यवस्था के तो हाल ही निराले रहे। पुलिस अधिकारी अपने इलाको के अपराधियों से ज्यादा खाली प्लाट और हवाला वालों पर ज्यादा नजर रखते रहे। बड़े घरों के हालात और भी बदतर थे, जहां फाईल पर फैसला पहले लिखा जाता था फिर उसी हिसाब से जांच की जाती थी। पैमेन्ट कैश में था और नोएड़ा, दिल्ली और लखनऊ के ठिकानों पर प्री पेड़ था।

उम्मीद पर दुनिया कायम है पर क्या रवायत बदल पायेगी, ये कहा नही जा सकता। तब तक तो नही, जब तक राजस्थान के युवाओं की खेप को भविष्य का हिस्सेदार बनाने के लिए बीज नही बोये जायेगें।

 

 

 

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