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अशोक गहलोत की अग्नि परीक्षा होगी आने वाली सर्दियां।।

राजनीति में कुछ लोग वक्त के साथ कुछ लोग बदल नही पाते पर फिर बाद में उन्हे पता चलता है कि वक्त बदल चुका है। ऐसे ही एक शख्स है, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और आने वाली सर्दिया उनके लिए राजनीतिक शीतकाल की शुरुआत साबित हो सकती है।

गहलोत को कांग्रेस की राजनीति का सबसे माहिर औऱ शातिर खिलाड़ी माना जाता है। इसमें कोई दो राय भी नही है पर यह सच है, दिल्ली की कांग्रेस की राजनीति के लिए। राजस्थान में गहलोत की राजनीति हमेशा से ही कांटो का ताज रही है। गहलोत भले ही तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गये हो पर राजस्थान की राजनीति के शतरंज में उनके खिलाफ शह देने का खेल किसी ना किसी रुप मे जारी रहा है। ये बात अलग है कि मात अभी तक हमेशा उनके विरोधियों ने ही खाई है।

पर, इस बार मुकाबला गदराए-छितराएं कांग्रेसियों से नही बल्कि अमित शाह औऱ मोदी से है। कर्नाटक में महागठबंधन का काम तमाम हो चुका है, मध्यप्रदेश की तैयारी है औऱ फिर राजस्थान की बारी है। अशोक गहलोत को विधानसभा सत्र के दौरान जब इस बारे में बताया गया तो उन्होने विधायकों की संख्या उनके पक्ष में होने का हवाला देते हुए, तख्तापलट की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। गहलोत को अपनी कुर्सी उस समय हिलती हुई दिखाई दी जब उनके सामने बैठे व्यक्ति ने उन्हे ये बताया कि भाजपा राजस्थान में नये सिरे से चुनाव चाहती है। ऐसे चुनाव, जिसमें ना तो गहलोत ना ही वंसुधरा राजे का कोई अहम रोल होगा।

विधायको की गणित पर नजर ड़ाले तो बसपा के छह विधायकों में से केवल राजेन्द्र सिंह गुढ़ा ही ऐसे व्यक्ति है जिन पर गहलोत बंद आंख भी भरोसा करते है। यही कारण है कि उनके जीजा औऱ कोलायत विधायक भंवरसिंह भाटी, बारहवी पास होने के बावजूद भी, राजस्थान के उच्च शिक्षा मंत्री है।

राजकुमार, रामकेश मीणा और महादेव सिंह खंड़ेला के अलावा किसी अन्य निर्दलीय विधायक के बारे निश्चित रुप से कुछ नही कहा जा सकता। आरएलड़ी के सुभाष गर्ग, गहलोत के विश्वासपात्र है। संयम लोढा, सिरोही की राजनीतिक मजबूरियों से पार पाने के लिए अपने लिए नये समीकरण तलाश सकते है। ट्राईबल पार्टी के दो विधायक अभी विपक्ष में है औऱ बेनीवाल को विरोध की राजनीति हमेशा रास आती है।

ऐसे में राजस्थान में भाजपा के खेल की संभावनाओं से इंकार नही किया जा सकता। भाजपा का खेल, सितम्बर में राज्यपाल कल्याणसिंह के रिटायर होने के बाद शुरु होने के कयास लगाये जा रहे है। हालाकिं, अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री होते हुए ऐसा कोई खेल, केक-वॉक निश्चित रुप से नही होगा। पर, बड़ा सवाल ये कि कि छह महीनों में ही ऐसा क्या हुआ कि ना तो जनता और ना ही विधायकों को गहलोत का राज रास आ रहा है?

नरेन्द्र मोदी औऱ अशोक गहलोत में सबसे बड़ा अंतर ये है कि मोदी अफसरशाही को काम में लेते है औऱ गहलोत अफसरशाही के भरोसे रहते है। गहलोत की नीति औऱ रीति को उनके मुंह लगे राजनीतिक छुटभईये नेता जनता तक पहुंचाने मे पूरी तरह से फेल रहे है। राजस्थान की राजनीतिक धुरी नागौर में गहलोत की नैया महेन्द्र चौधरी के भरोसे है जो खुद के अगली बार विधायक का चुनाव जीतने की गांरटी नही ले सकते। दूसरा उदाहरण जयपुर शहर में महेश जोशी है। राजीव अरोड़ा, पुखराज पाराशर, धर्मेन्द्र राठौड़ औऱ रणदीप धनखड़ अपने दम पर पार्षद या सरंपच का चुनाव भी नही जीत सकते। नये सखा घनश्याम तिवाड़ी को घात करने में महारत हासिल है।

हालाकिं स्वयं की लकीर लंबी दिखाने के लिए छोटी रेखाओं के सामने खड़े रहने का ख्याल निश्चित रुप से मृगमरिचिका दिखा सकता है पर राजनीति का खेल अब टेस्ट मैच से ट्वन्टी ट्वन्टी हो चुका है – क्योकि ये मोदी का जमाना है।

अशोक गहलोत के सामने सबसे बड़ी चुनौती खींवसर औऱ मंड़ावा में विधानसभा उपचुनाव जीतना है। इन चुनावों में कांग्रेस की हार, आने वाले समय की ठंड़ी हवाओं का अहसास निश्चित रुप से करा देंगी। उससे पहले गहलोत के पास मौका है कि अगर वे अगले तीन महीने में नये विचार औऱ युवाओं शक्ति का समावेश अपनी राजनीति में कर, जनता को संदेश देने की कोशिश कर सकते है। आम आदमी पिछली सरकार में भ्रष्टाचार से त्रस्त था पर उससे भी ज्यादा अब अफसरशाही के पैरों तले दबे कुचले हुए सरकारी सिस्टम से परेशान है। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व से उम्मीद लाजिमी है कि जनता को सरकार का अहसास हर स्तर पर हो।

देश में बयार निश्चित रुप से बदलाव की चल रही है। देखना ये कि कांग्रेस के खांटी नेता बदलते समय के साथ खुद को ढाल पाते है या फिर पटाक्षेप ही उनकी नियति है।

 

 

 

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