You are here
Home > India > कांग्रेस के लिए वसुंधरा राजे के ट्रॉजन हार्स साबित हो सकते है मानवेन्द्र सिंह

कांग्रेस के लिए वसुंधरा राजे के ट्रॉजन हार्स साबित हो सकते है मानवेन्द्र सिंह

ट्रॉजन हार्स – कुख्यात कम्प्यूटर वायरस का ये नाम ग्रीक कथाओं से आया है। होमर ने अपने काव्य इलियड़ में वो कहानी सुनाई है जिसमें ग्रीक सेना जब ट्रॉय को हराने में कामयाब नही हुई तो वे एक लकड़ी का बड़ा घोड़ा उनके दरवाजे पर छोड़ कर पीछे हट गये। जोश जोश में ट्रॉय के लोग उस लकड़ी के घोडे को अपने किले की अभेद दीवारों के पीछे ले गये और उसके बाद ट्रॉय के विनाश की कहानी से सभी परिचित है। राजनीति में ट्रॉजन हार्स की कभी कमी नही रही। पर राजनीति का घोड़ा अगर मालानी नस्ल का हो तो उत्सुकता बढ़ ही जाती है। दिल्ली से दुबई की कई बरसों की दौड़ के बाद, मालानी के ये लाड़ला आज सपत्नीक बाड़मेर की जनता की सेवा में उतर गया है। नाम है – मानवेन्द्र सिंह।

मानवेन्द्र सिंह ने पचपदरा की स्वाभिमान रैली में भाजपा छोड़ने का ऐलान तो कर दिया पर धड़कने भाजपाईयों की बजाय कांग्रेसियों की तेज हो गयी। राजस्थान के कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पॉयलेट और मानवेन्द्र पुराने साथी है वही अफवाह उड़ाने वाले ये भी कह रहे है कि अशोक गहलोत ही मानवेन्द्र सिंह की बगावत के सूत्रधार है। हालांकि कांग्रेस ने अभी तक मानवेन्द्र सिंह को पार्टी में लेने या ना लेने के बारे में पत्ते नही खोले है पर मानवेन्द्र सिंह को घनश्याम तिवाड़ी का न्यौता जरुर मिल गया है। कांग्रेस की राजनीति के कुछ पुराने चावलों का मानना है कि मानवेन्द्र सिंह राजस्थान चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस के लिए ग्रीक ट्रॉजन हार्स साबित हो सकते है। विचार तो ड़राने वाला है, पर कैसे?

मानवेन्द्र सिंह ने भाजपा छोड़ने के बाद कहा कि राजस्थान में वसुंधरा राजे को उनसे ज्यादा कोई नही जानता। उन्होने ये भी कहा कि पिछले चार सालों में ना तो उन्होने वसुंधरा राजे को याद किया ना ही राजे ने उन्हे। ये बेरुखी और तल्खी बाडमेर की जनता को तो रुहानी लग सकती है पर जयपुर के सिटी पैलेस के कुछ चमगादड़ जागे हुए थे जब इसी साल मार्च के महीने में मानवेन्द्र सिंह और वसुंधरा राजे देर रात तक चली पार्टी में कदम-ताल मिला रहे थे। ऐसे में क्या मानवेन्द्र सिंह वही कर रहे है जो वसुंधरा राजे चाहती है या फिर वे उनके ट्रॉजन हार्स है जो कांग्रेस को राजस्थान में पटखनी देने में तुरुप का इक्का साबित हो सकते है।

वैसे भी मानवेन्द्र सिंह, दुबई के मंहगे विदेशी सिगार से लेकर भैसरोड़गढ़ की देशी बीड़ी तक के स्वाद में मौके और दस्तूर के अनुसार ढलना जानते है।

बड़ा सवाल ये कि क्या मानवेन्द्र सिंह का कांग्रेस में जाना, किसी भी तरह से कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा। औऱ, उत्तर साफ ना है। इसमें कोई दो राय नही कि राजपूत समाज राजस्थान में वसुंधरा राजे से नाराज है। नाराजगी का सबसे बडा कारण वसुंधरा राजे का खुले रुप से जाट समाज को तवज्जों देना है। राजस्थान की राजनीति में जाट सबसे बड़ी ताकत है और भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार पहली बार तभी बन पायी जब 2003 में जाट वसुंधरा राजे के पीछे पीछे भाजपा में आ गये। खांटी भाजपाई सच्चाई स्वीकार करने को तैयार नही थे इसलिए जाटों को पार्टी के बढते जनाधार का ट़ॉप-अप मान बैठे। वसुंधरा राजे के नेतृत्व में टॉप-अप स्कीम ही नया प्लान था। कांग्रेस की सरकार राजस्थान में जाटों के समर्थन के बिना किसी हालत में नही बन सकती। मानवेन्द्र सिंह की कांग्रेस में एंट्री से अगर किसी को फायदा होगा तो वो वसुंधरा राजे है क्योकि जाटों के पास जाने के लिए उनके अलावा कोई और विकल्प मौजूद नही होगा। दिल्ली के भारी दबाव के बावजूद वसुंधरा राजे जाटों के समर्थन की धमकी देकर राज में पिछले पांच साल से बनी हुई है औऱ जाटों का छुकाव उनके लिए फिर से वरदान साबित हो सकता है, और यही तो वो चाहती है।

दूसरी तरफ, राजपूत नाराज है पर क्या भाजपा से इतर जा कर वोट करेगा, कहना बड़ा मुश्किल है। अजमेर उपचुनाव कृपया याद ना करे, क्योकि वहां भाजपा की हार के कई और कारण भी थे। ऐसे में कांग्रेस के परिपेक्ष्य से देखा जाये तो मानवेन्द्र सिंह के कांग्रेस में जाने से भले ही राजपूत वोट मिल ना मिले, मालाणी और मारवाड़ के जाटों का वोट कांग्रेस को नही मिलेगा। ऐसे में सचिन पॉयलट हो या अशोक गहलोत, कोई भी इतनी बड़ी रिस्क नही लेना चाहेगा। गहलोत के हर सियासी दांव को वैसे भी राजस्थान के जाट बहुत ही करीब से देखते है, ऐसे में मानवेन्द्र सिंह का कांग्रेस में आना अगर किसी को सीधा नुकसान पहुंचाएगा तो वो अशोक गहलोत होगें। सचिन पॉयलट को वैसे भी अभी जाटों ने नेता मानना शुरु नही किया है।

सतनाली से घंटियाळी तक जाटों का एक ही सवाल है आखिर मानवेन्द्र को कांग्रेस में ला कौन रहा है।

राजस्थान में जाट कभी भी राज से बाहर जाने वाले के साथ नही रहा। ऐसे में कांग्रेस के खेमें के जाट नेताओं की बांछे अब खिली खिली नजर आ रही है। पर मानवेन्द्र सिंह के साथ राजपूतों के उन धड़ों की छाया भी कांग्रेस पर पड़ेगी जो सामराउ से नागौर से ड़ीडवाना से सीकर औऱ बुहाना खेतड़ी तक अपने छोटे मोटे स्थानीय मुद्दों को जातीय संघर्ष में बदलने का प्रयास करते रहे है। कांग्रेस के लिए पहला लक्ष्य विधानसभा चुनाव जीतना है पर कांग्रेस में आने को तैयार बैठे मानवेन्द्र सिंह, तारणहार की बजाय अनचाहा भार भी साबित हो सकते है।

बाड़मेर जिले की सीमा से आगे मानवेन्द्र सिंह का असर जैसलमेर पर भी है। पर वहां कांग्रेस की राजनीतिक बिसात गाजी फकीर के दरबार में तय होती है। सिंधी मुसलमानों का मानवेन्द्र सिंह के परिवार से पुराना नाता रहा है और पीर पगारों की दरगाह की आवाज उनके पक्ष में आती रही है। नरेन्द्र मोदी की भाजपा में रहते हुए मानवेन्द्र सिंह को सिंधी मुसलमानों के वोट मिलना मुश्किल था। दलित वर्ग भी अब भाजपा से खासा नाराज है। राजपूत-दलित-मुसलमान का समीकरण किसी को भी जैसलमेर-बाड़मेर में चुनाव जीता सकता है और मानवेन्द्र सिंह भी इसी जादुई समीकरण पर आंख जमाये बैठे है। वेन्टीलेटर पर पड़े उनके पिता जसंवत सिंह के प्रति सहानुभूति उनके लिए दूसरा एडवांटेज रहेगी।

मानवेन्द्र तो लोकसभा का चुनाव जीत कर दिल्ली जाने की पुरी जुगत लगा रहे है पर क्या राजस्थान की कांग्रेस उनके जैसे भारी राजनीतिक व्यक्तित्व का भार झेल पायेगी, ये बड़ा सवाल है। अब फैसला राहुल गांधी को करना है कि वो मानवेन्द्र के रुप में भविष्य के मुख्यमंत्री के पांचवे नाम अपनी लिस्ट में शामिल करना चाहते है या नही। वैसे, आपकी जानकारी के लिए, ‘हम पांच’ में चौथा नाम अजमेर उपचुनाव के बाद रघु शर्मा का है औऱ पांचवा नाम शामिल होने ही वाला है।

आखिर में यही कहां जा सकता है – पंच देव स्यूं रक्षा करो, नी तो कांग्रेस काणीं होई।   

 

Leave a Reply

Top