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ज्यादा जहरीले सांप को पहले मारेगा नागौर का राजपूत

रेसम री ड़ोरी करै, नित-प्रति लावै धोय…।

खूंटै बन्धै हेम रै, गधो तुंरग ना होय…।।

बात तो पते की है पर अमित शाह ने मारवाड की सयानी बाते शायद कभी सुनी नही होगी। यही कारण है कि हनुमान बेनीवाल औऱ अमित शाह की सौदेबाजी ने मारवाड़ में चुनाव का रंग बदल दिया है। पहला असर ये हुआ कि मारवाड में मोदी लहर का दम घुट गया। दूसरा ये कि मारवाड़ का जाट पूरी तरह से बंट गया और तीसरा ये कि राजपूत और मूल ओबीसी को अब ये समझ में आ गया कि भाजपा अब उनकी पार्टी नही रही, जिसे भैरोंसिंह शेखावत ने अपने खून पसीने से सींचा था। रही बात मुस्लिम औऱ दलित की, उन्हे तो पहले से ही अमित शाह की भाजपा ने अलग कर दिया था। मारवाड की पांचो सीटों पर अब चुनाव जातिगत समीकरणोँ औऱ सोशल इंजिनियरिंग का चुनाव होगा और सबसे ज्यादा रोचक मुकाबला उन सीटों पर होगा जहां राजपूत मतदाता निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है – नागौर औऱ बाडमेर।

पुसत पुराणा, धण नवी, ठाकर सूर-सुजान…।

संकर तूंठा पाईये, मनवांछित कैकाण…।।

नागौर की राजपूत के पास इस बार पूरा मौका है कि वो अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से साबित करे। बेनीवाल की बोतल और कांग्रेस के मुकाबले में नागौर के राजपूत को सांपनाथ और नागनाथ में से एक को चुनना है औऱ सीधी सी बात है कि समझदारी इसी में है कि ज्यादा जहरीले सांप को पहले मारा जाये।

विडम्बना ये है कि राजपूतों में जयचन्दों की भरमार है। थोड़े से निजी फायदे के लिए समाज का नुकसान करने वाले इन लोगों ने अभी से बहुजन समाज पार्टी से प्रत्याशी खड़ा करने के लिए माहौल बनाना शुरु कर दिया है। ध्यान से देखे तो इसका सीधा फायदा हनुमान बेनीवाल को होगा औऱ सूत्रधार वही पुराने लोग होगे जिन्होने बेनीवाल की राजनीति को इस मुकाम पर पहुंचाने में मदद की है। दुर्ग सिंह और बेनीवाल का फ्रेन्डली मैच नागौर का राजपूत पिछले पन्द्रह साल से झेल रहा है। वही जयचन्द शब्द का आजकल धडल्ले से उपयोग करने वाले “जयचन्द के वंशज” राजेन्द्र राठौड की भूमिका का सभी को पता है कि पहले राठौड़ ने बेनीवाल की राजनीति के पौधे को सींचा औऱ अब वसुंधरा राजे के खिलाफ उसका उपयोग कर रहे है। भाजपा के सूत्रों के मुताबिक बेनीवाल औऱ अमित शाह की ड़ील में राजेन्द्र राठौड़ ने बड़ी भूमिका निभाई है।

राजनीतिक समझ ये कहती है कि हनुमान बेनीवाल आज का सबसे बड़ा खतरा है औऱ पहले उससे ही निपटा जाना चाहिए। पर बेनीवाल के भाजपा से गठबन्धन करने के बाद यदि राजपूत समाज अपना उम्मीदवार मैदान में उतारता है तो इससे बेनीवाल की मदद ज्यादा होगी। बसपा या निर्दलीय रुप से आने वाला राजपूत प्रत्याशी कही ना कही बेनीवाल की मदद ही करेगा। ऐसे में नागौर के राजपूत के पास राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए कांग्रेस का दामन थामने का विकल्प खुला है। कारण ये कि नागौर में अगर राजपूत बेनीवाल के खिलाफ कांग्रेस के खेमें में चला गया तो इसका सीधा असर बाड़मेर पर होगा, जहां राजपूत औऱ मूल ओबीसी मोदी लहर के कारण अभी तक मानवेन्द्र सिंह के साथ पूरे मन से खडे नजर नही आ रहे। अब दारोमदार नागौर के राजपूतों पर है जिससे वे हनुमान बेनीवाल को उसके ही खेल में धूल चटा दे और साथ ही मानवेन्द्र सिंह की जीतने में मदद करे।

हनुमान बेनीवाल मारवाड़ की राजनीति का घोड़ा साबित होगा या गधा, ये फैसला राजपूत औऱ मूल ओबीसी को करना है।  

हनुमान बेनीवाल के भाजपा से गठबंधन के बाद जोधपुर में भी गजेन्द्र सिंह शेखावत की स्थिती कमजोर हुई है। राजपूत औऱ रावणा राजपूत वोटों का बडा हिस्सा शेखावत से छिटकने के आंशका है और जोधपुर का वोटर अशोक गहलोत के पाले में जाने का मन बना चुका है। वैसे तो मारवाड़ में राजनीतिक रुप से सबसे समझदार कौम जाट ही है पर इस बार राजपूत भी अपनी राजनीतिक समझ को उपयोग में लेने का मन बना चुका है। राजस्थान में भाजपा ने अपनी रणनीति राजपूत और मूल ओबीसी वोट को अपनी जेब में मानकर बनायी है पर पानी आज भी मारवाड़ में गहरा बहता है औऱ 2019 का चुनाव उस गहरी सोच औऱ इच्छा शक्ति का भी टेस्ट होगा।

नागौर में मुकाबला हनुमान बेनीवाल औऱ ज्योति मिर्धा के बीच ही होगा। अब फैसला नागौर के राजपूतों को करना है कि वे किंगमेकर की भूमिका में रहना चाहते है या फिर जयचन्दों के चक्कर में अपनी ढ़पली अलग से बजाएगें। ध्यान रहे, नागौर राजस्थान की राजनीति की धुरी है और नागौर की हवा का असर पूरे मारवाड़ पर होगा।

आड़ तरै तो तरण दे, तूं कां तरै रे कग्ग…।

नीची होसी नाकड़ी, ऊंचा होसी पग्ग…।।

ये बात नागौर के चुनाव पर सटीक बैठती है और बेनीवाल को “कागला” साबित करने का भार अब नागौर के राजपूतों और मूल ओबीसी के कंधो पर है।

 

 

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