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राजस्थान में संगठन मंत्री के आम होते चर्चे !!

कृशः कायः खण्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो, व्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः।

क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरजकपालर्पितगलः, शुनीमन्वेति श्वा इतमपि च हन्त्येव मदनः।।

किसी जमाने में संगठन मंत्री होने का मतलब होता था कि भाईसाहब का आदर सर्वोपरि है औऱ भाईसाहब विचार-परिवार के प्रतिनिधी होने के साथ साथ रीति-नीति के वाहक भी है। पर, सूत्रो की माने तो संस्कृत में उपर दिया गया वर्णन पहली मंजिल वालो पर पूरी तरह से ठीक बैठता है, जो समझ सके वो समझ ले। पूर्णकालिक प्रचारक की ऐसी हालत पर अगर अब केन्द्रीय नेतृत्व को अगर शर्म आये तो थार के रेगिस्तान में चुल्लु भर पानी तो मिल ही जायेगा। अब फैसला केन्द्रीय नेतृत्व करे कि उस चुल्लु भर पानी में राजस्थान की भाजपा डूबेगी, नेतृत्व डूबेगा या फिर भाईसाहब।

ज्यां का ऊंचा बैसणा, ज्यांका खेत निवाण।

ज्यां का बैरी क्या करै, ज्यां का मीत दीवाण..।।

कहानी कुछ ऐसी है कि बंसल औऱ रामलाल ने जिस तरह से शाही टीम में राणा को घुसाया, उसी तरह से राजस्थान में मिश्रा जी की नियुक्ति करवायी। जमाना वसुंधरा राजे का था, केन्द्रीय नेतृत्व राजस्थान में संगठन पर फिर से कब्जा चाहता था। ऐसें में मिश्राजी राजस्थान में फिट कर दिये गये पर गजेन्द्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष बनाने का मामले पर राजे ने पैर गड़ा दिये। खींचतान में सरकार चली गयी औऱ बाद में चले गये सबके प्यारे मदन लाल सैनी जी। संघ ने सतीश पूनियां की नियुक्ति तो राजे के विरोध के बावजूद करवा दी पर राजस्थान की असली कमान अभी भी मल्टीटैलेन्टेड भाईसाहब के हाथ ही है। वैसे, एक किस्सा ऐसा भी है जब भाईसाहब उन पण्डित जी पर भड़क गये थे जिन्होने उनकी कुंड़ली देख कर कहा था कि ‘आप सर्वगुण सम्पन्न है।’     

पहली नही विचारियों, पाछे करै विचार..।

मूंड़ मुंड़ाया, माल कह, पूछै लगन गंवार..।।

गंगा किनारे वालो की भाषा में कहे तो कार्यालय में आजकल ‘काचे कलवे’ लौन्डों का आना जाना बढ गया है। सीकर वाले एक महाशय का ग्राफ तो इतना तेजी से बढा है कि बाईस गोदाम में छपाई की फेक्ट्री के साथ साथ अपने शहर में एक सोने के जेवरात का शो रुम भी खोल लिया। वैसे भी भाईसाहब तो प्रचारक है, उन्हे माया मोह से क्या मतलब। जानकारों का मानना है कि वो जो एक कार एक महीने से ज्यादा वक्त तक भाजपा कार्यालय में नजर आती थी, बाद में पता चला था कि किसी गंभीर मामले में फंसे एक व्यक्ति से संबधित थी।  

उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो।

निस्तीर्ण सरितांपतिःर्नृपतयो यत्नेन सन्तोषिताः।।

मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः।

प्राप्तः काणवराटकोपि न मया तृष्णेधुना मुण्च माम्।।

कार तो भाईसाहब को लेने भी आती है। कभी राधेश्याम जी वाली औऱ कभी विश्नोई की। चित्रगुप्तों को अभी तक ये पता नही चल पाया है कि आखिर ले जाती कहां है औऱ उसके बाद क्या क्या होता है। वैसे मेरा मानना है कि लहुट्टी, चित्रगुप्तों से ज्यादा टेलेन्टेड है, वो बता सकता है कि आखिर माजरा क्या है। रात के शो में फिल्मे देखने से लेकर जीवन के अतिरेक आन्नद से सराबोर जीवन, संघ के युवा प्रचारक को काफी रास आ रहा है – ऐसा सूत्र तो बताते है पर दिल मानने को तैयार नही। वैसे, कार्यकर्ता आजकल यह जरुर कहते नजर आते है कि कार्यालय में बेताल है औऱ भाजपा के सर पर चढ कर बैठा है। संघ औऱ संगठन के उन लोगों का नाम भी इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जायेगा, जो सबकुछ जानकर भी अपना सर अपनी पैरों में छिपाकर उकडू बैठे है।

कठैक मति गोपाल री, गयी रटल्ली खांय…।

ब्रज में कैर-करील तरु, मेवा काबुल मायं..।।

दीवाली तो इस बार सभी की फीकी रही, पर भाजपाई ये मानने को तैयार नही होते। पर राजस्थान भाजपा के इतिहास में पहली बार, भाजपा कार्यालय के कर्मचारियों को बोनस नही दिया गया। मिला भी तो केवल एक को औऱ उस कृपा की निश्चित रुप से कोई खास वजह रही होगी। बेताल की सेवा चाकरी तन-मन से की गई बताते है। सतीश पूनियां ने कर्मचारियों को मिठाई का डिब्बा तो अपने हाथों से दिया पर उनसे आंखे नही मिला पाये। वैसे भी राजस्थान भाजपा का बेताल, सतीश पूनियां के सिर पर ही सवार है।

रेसम री ड़ोरी करै, नित-प्रति लावै धोय…।

खूंटै बन्धै हेम रै, गधो तुंरग ना होय…।।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो देश की तरक्की के लिए सारे प्रयास किये है। पर, उनकी नाक के नीचे किस तरीके से गधों को रंग कर घोड़ा बनाया जा रहा है, वह शायद उन्हे पता नही होगा। होगा भी कैसे, क्योकि उत्तरप्रदेश में सरकार संगठन मंत्री चला रहै है औऱ वे सीधे कहां रिपोर्ट करते है, उसका सभी को पता है। राजस्थान में सरकार तो नही है पर ‘सरकार-राज’ जरुर चल रहा है। राजस्थान ने भाजपा में प्रकाशचन्द जैसे संगठन मंत्री भी देखे है औऱ चेन्नारैड्डी जैसे राज्यपाल भी। ऐसे में बेताल की छुट्टी भी आज या कल हो ही जायेगी। पर, बेताल रवानगी से पहले जिस सिर पर बैठा है उसका सत्यानाश जरुर कर जायेगा। अब सोचना संघ के नेतृत्व को भी होगा कि क्या यही वह रीति नीति है जिसे वह देश के युवाओं को दिखाकर राष्ट्रवाद की भावना को कूट कूट कर भरना चाहते है।

जहां तक संघ की रीति नीति तो नीचे लिखी है पर राजस्थान में संगठन में स्तर कितना और गिरेगा, इसका अंदाजा बेताल के रहते हुए लगाना मुश्किल काम है – पाताल तोड़ प्रयास, कह सकते है।    

मूरत सूं कीरत बड़ी, विन पांखा उड़ जाय…।

मूरत तो मिट जावसी, कीरत कठै ना जाय..।।

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