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राजस्थान में सवालों के बर्ड हिट झेलती पायलट की उड़ान

एक प्रेस कांफ्रेस में सचिन पायलट से उनके “बाहरी “होने पर सवाल पूछा गया तब वे ना तो विचलित हुए ना ही परेशान। उन्होने बड़ी ही शालीनता से बताया कि उनका राजस्थान से संबध 1979 से है जब वे केवल ढ़ाई साल के थे। उन्होने ये भी बताया कि उनका जन्म सितम्बर 7, 1977 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ औऱ उनकी बहन का जन्म हैदराबाद में हुआ जहां उनके पिता राजेश पायलट पोस्टेड़ थे। सचिन पायलट मूल रुप से उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के वेदपुरा गांव के रहने वाले है। यह सभी को स्वीकार करना होगा कि सेना के तीनों अंगों में काम करने वालों के परिवार किसी राज्य या प्रांत के नही बल्कि पूरे देश के होते है।

सचिन पायलट ने सीधे सीधे कहा कि उनके पिता राजेश पायलट का राजस्थान से लंबा नाता रहा है औऱ वे राजस्थान में बाहरी नही कहे जा सकते। राजेश पायलट का राजनैतिक करियर इंदिरा गांधी के देन थी। पर, सचिन पायलट को भी शायद ही मालूम होगा कि भारतीय वायु सेना ने आजाद भारत के इतिहास में कभी अपने ही नागरिकों पर गोलियां औऱ बम बरसाये है ऐसा एक ही उदाहरण है – वो है मार्च 6, 1966 को मिजोरम की राजधानी आईजवाल पर हुई बमबारी। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो पायलट जिन्होने इस ब्लैक ऑपरेशन को अंजाम दिया वह थे – राजेश पायलट औऱ सुरेश कलमाड़ी। दोनों ही आगे जा कर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार हुए। विकिपिडिया पर भी आईजवाल हमले की काफी जानकारी मौजूद है औऱ दिल्ली के एक दिग्गज पत्रकार ने नाम लेकर इस बारे में एक बड़ा आर्टिकल भी लिखा था।

इस सब के बावजूद सचिन पायलट को राजस्थान में “बाहरी “कहना गलत ही होगा।

राजस्थान में ऐसे लोगो की लंबी फैहरिस्त है जो कि “बाहरी” थे पर राजस्थान की अपनायत में घुल मिल गये। राजस्थान से चुने गये बाहरी नेताओं में बलराम जाखड़, बूटा सिंह, बंगारु लक्ष्मण जैसे बड़े नाम शामिल है। पर, सवाल जब मुख्यमंत्री बनाने का हो तो मुद्दा उठना लाजमी है। सचिन पायलट के लिए सवाल यही खत्म नही हो जाते।

सचिन पायलट के सामने सवाल ये भी कि क्या गांधी परिवार ने उनके पिता की विद्रोही नीति के बावजूद उन्हे पूरी तरह अपना लिया है। या फिर पप्पू औऱ चंपू की ये जोड़ी केवल कांग्रेस का मुखोटा भर है। जून 11, 2000 को जब राजेश पायलट के दौसा के भंडाना गांव के पास कार पलटने से मौत हुई तब वे जयपुर एयरपोर्ट की तरफ तेजी से कार चला कर जा रहे थे। राजेश पायलट को सीताराम केसरी के साथ मिटिंग की जल्दी थी। पायलट, सीतराम केसरी औऱ जितेन्द्र प्रसाद ने पार्टी के अंदर रह कर विदेशी यानि “बाहरी” होने के मुद्दे पर सोनिया गांधी का विरोध करने का निर्णय लिया था वही शरद पंवार, पी ए संगमा औऱ तारिक अनवर ने एनसीपी का गठन कर लिया।

इसमें कोई दो राय नही है कि राजेश पायलट का राजस्थान से लंबा नाता रहा। उन्होने 1980 में भरतपुर लोकसभा से चुनाव जीता औऱ बाद में पांच बार दौसा से सांसद रहे। राजेश पायलट की नजर जयपुर पर कभी नही रही, ऐसे में स्थानीय नेताओं से दो दो हाथ की नौबत उनके समय में नही आयी। राजेश पायलट की मौत के बाद उनकी सांसद पत्नी रमा पायलट ने दौसा का उप चुनाव केवल इसलिए लड़ी क्योकि वे राजनैतिक विरासत को सचिन पायलट के लिए बचाना चाहती थी। 2004 में सचिन पायलट ने दौसा लोकसभा का चुनाव 70000 मतों से जीता औऱ फिर 2009 में वे अजमेर से सांसद चुने गये।

सचिन पायलट के सामने सवाल ये भी है कि क्या वे इस बार अपनी पत्नी सारा को चुनावी प्रचार के लिए ला पायेगे। सवाल ये भी है कि क्या रमा पायलट इस बार राजस्थान में प्रचार करेगी। सवाल ये भी है कि पैराड़ाइस पेपर से जुड़े मामले में सचिन पायलट का नाम आने के बाद क्या राहुल गांधी उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहेगें।

सबसे बड़ा सवाल सचिन पायलट के सामने नही बल्कि कांग्रेस के सामनें है कि गुर्जर जाति के एक विधुड़ी के लिए क्या कांग्रेस का परंपरागत मीणा वोट सपोर्ट करेगा। सवाल ये भी है कि क्या राजस्थान का जाट सचिन पायलट के साथ खड़ा होगा, क्योकि अभी तक जाट नेताओं के नाम पर सचिन पायलट चुके हुए खाली कारतूसों का कुनबा ही इकट्ठा कर पाये है।

सवाल ये भी है कि क्या सचिन पायलट इस बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बन पायेगें।

 

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