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उपचुनाव के नतीजों ने दिए जाट राजनीति की बदलती हुई हवा के संकेत।

वणज करैला वाणियां, और करैला रीस..।

वणज किया था जाट नै, सो का रह गया तीस..।।

हनुमान बेनीवाल ने अपने भाई नारायण की नैया किसी तरह से पार लगाने में सफलता तो पायी, पर खींवसर के उपचुनावों में बेनीवाल की पोल भी खुल कर सामने आ गयी। अगर बोगस वोटिंग नही तो चुनावों के खींवसर के चुनावों के बेताज बादशाह कहलाये जाने वाले हनुमान बेनीवाल किसी भीगी बिल्ली की तरह दिखाई देगें।

खैर, नारायण बेनीवाल ने चुनाव जीत लिया और उनको बहुत बहुत बधाई। नारायण का चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि उनको चुनावी मैदान में उतरने से परिवार के लोगों से दो-चार होना पड़ा। हनुमान बेनीवाल का आखिर तक यही मानना था कि नारायण के राज योग नही है पर लोकतंत्र में राजयोग जनता तय करती है, हाथ की लकीरे नही।

हरेन्द्र मिर्धा चुनाव तो हार गये पर उनके चुनाव की खास बात ये रही कि दशकों बाद पूरे मिर्धा परिवार ने साथ आ कर चुनाव में मोर्चा संभाला। हरेन्द्र मिर्धा ने लोकसभा चुनावों में ज्योति मिर्धा से कन्नी काट ली थी, वही रिछपाल मिर्धा ने भी साथ नही दिया था। ऐसे में अशोक गहलोत के दबाव में ही सही, मिर्धा परिवार का एक साथ आना, नागौर के नाथूपंथियों के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है।

 

अंग मे राखै आंट, करमां री पासी कनै…।

जटा बन्धायां जाट, सिद्ध हुवै न मोतिया..।।

वैसे, विधानसभा उपचुनावों के नतीजे हनुमान बेनीवाल और भाजपा में उनके तारणहार राजेन्द्र राठौड़ के लिए हवा की उलटे रुख के संकेत दे रहे है। राजेन्द्र राठौड़ को झुंझुनूं वालों ने पहले सूरजगढ़ के उपचुनावों में पटखनी दी और अब फिर से मन्ड़ावा की तीस हजार वोटों से ज्यादा की हार का, उनकों आलाकमान को जवाब देना होगा। राजेन्द्र राठौड़ काफी दिनों ने मंड़ावा में ड़ेरा ड़ाले थे और शेखावटी के सबसे बड़े नेता का तमगा पहनने वाले, इस चलते पुर्जे नेता ने, कोई कसर भी नही छोडज़ी।

राजेन्द्र राठौड़ की मंड़ावा में की हुई मेहनत से, उनकों उम्मीद थी कि दिल्ली में आलाकमान की नजर में उनका कद स्थापित हो जाएगा। भैंरोसिंह शेखावत की गोदी से वसुंधरा राजे की आस्तीन तक और अब उनको किनारे लगाने के बाद, खुद अपने लिए ब़ड़ी कुर्सी की तलाश करते हुए, राजेन्द्र राठौड़ ने राजनीति में लंबी पारी खेली है। पर, उनके दांव अब ज्यादा असरदार नजर नही आते क्योकि राजनीति में सफलता मायने रखती है। बेनीवाल की खींवसर मे हुई कुटाई और मंड़ावा की भारी हार, राजेन्द्र राठौड़ के लिए बुढापे का सदमा साबित हो सकती है, अगर आने वाले दिनों में अमित शाह के दरबार में उनका भाव उतरना जारी रहा।

सूहव सीस गुथांय कर, गइ गांव री हाट…।

विणज गमायो वाणियों, बळद गमाया जाट..।।

वैसे, हरियाणा के चुनाव हो या फिर राजस्थान के उपचुनाव, इनके नतीजे देख कर अमित शाह को एक बात तो जरुर समझ आ गयी होगी कि उत्तर भारत में राजनीतिक सफलता की चाबी जाटों की जेब में रहती है। अमित शाह ने झुंझुनूं में सांसद नरेन्द्र खींचड़ के बेटे को टिकट देने की बजाय सुशीला सींगड़ा पर दांव लगाया जिसे ब्रजेन्द्र ओला का सीधा समर्थन हासिल था। ऐसे में मंड़ावा के नतीजे की जिम्मेदारी भी अमित शाह और राजेन्द्र राठौड़ के सिर पर ही रहेगी।

मारवाड़ दौरे के बाद भाजपा के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां पर कांग्रेसियों ने हमला ये कह कर किया कि वे अपरिपक्व नेता है। राजनीति के हाशिये पर दशकों से कर्मयोगी की तरह साधना करते हुए सतीश पूनियां ने अपने लिए भाजपा में जगह तो बना ली है पर उनके राजनीतिक गुणों की असली परीक्षा अब शुरु होगी। अमित शाह ने उन्हे जिम्मेदारी तो महत्वपूर्ण दी है पर उनके सिर पर भारी भरकम संगठन मंत्री चंद्रशेखर मिश्रा को बेताल की तरह बिठा रखा है। ऐसे में दो ध्रुवों में बंटी भाजपा किस तरह से एकमुखी रह कर काम कर पायेगी, ये आने वाला वक्त ही बतायेगा।

रही बात वसुंधरा राजे की, तो राजस्थान में जाट की एक ही इच्छा थी कि पूरा जाट मुख्यमंत्री बने। इसलिए, अभी तक वे आधे जाट के साथ दिन निकालने पर मजबूर थे। आने वाले वक्त में दिल्ली की मजबूती या कमजोरी ये तय करेगी कि क्या वसुंधरा राजे को राजस्थान में कोई अहम् रोल मिल पाता है या नही। अभी, वे सत्ता और संगठन से सुरक्षित दूरी बनाये हुए है और अपने सही वक्त के आने का इंतजार कर रही है। यज्ञ, इस बात के लिए चल रहा है कि कोई बड़ा घोटाला उजागर ना हो जाए और अशोक गहलोत से उन्हे पूरी उम्मीद है कि ऐसा नही होगा।

बात जाटों की राजनीति की हो और उसमें अशोक गहलोत का जिक्र नही आये, ये नही हो सकता। राजस्थान का आम जाट युवा अशोक गहलोत को फूटी आंख भी देखना पंसद नही करता। पर ये अशोक गहलोत की राजनीतिक महारत है कि उन्होने नागौर में महेन्द्र चौधरी और धर्मेन्द्र राठौड़ जैसे चापलूसों से दूरी बना कर खींवसर का चुनाव हरेन्द्र मिर्धा औऱ ज्योति मिर्धा को साथ ले कर लड़ा। सचिन पायलेट से लगातार परेशान हो रहे, गहलोत को ये पता है कि बड़े जाट का उनके साथ होना बहुत जरुरी है। ऐसे में हरीश चौधरी, ज्योति मिर्धा औऱ विश्वेन्द्र सिंह की तिकड़ी उनकी समस्या का काफी हद तक समाधान कर सकती है।

चुनावो के नतीजे आ चुके है और अब राजस्थान में फोकस फिर से गहलोत औऱ पायलेट के बीच की रस्साकशी पर होगा। गहलोत की चालों का पायलेट ने अभी तक मुंहतोड़  और करारा जवाब दिया है, ऐसे में पायलेट की काट ढूंढने के लिए दिमाग खुजा रहे गहलोत के सामने समस्याए बरकरार है।

समाधान, है तो सही। पर हम बताये, ऐसा अभी कोई कारण नजर नही आता।

 

 

 

 

 

 

 

 

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