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क्या जल जायेगी राजस्थान में हनुमान बेनीवाल की लंका !!

“लूम लपेटी लंक को जारा, लाह समान लंक जरी गयी।“

लंका तो पूरी तरह से जल जाने के करीब है – पर ये लंका है हडूमान की। पांच साल तक उछल कूद मचाने के बात राजस्थान में तीसरे मोर्चे की बात करने वाले हनुमान बेनीवाल केवल 67 विधानसभा सीटों पर ही बोतल बांट पाये। खास बात ये कि बोतल पानी मे पानी कम निकला और जो था वो भी मारवाड़ के स्वाद का नही था। नागौर से मेड़ता औऱ जैतारण होते हुए आगे निकले तो खारिया-मीठा के आगे हनुमान बेनीवाल का राजनीतिक असर का नेटवर्क कॉल ड्राप कर रहा है।

हनुमान बेनीवाल ने बाड़मेर से बीकानेर और सीकर से जयपुर तक बड़ी रैलियां की और आखिरकार राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी की घोषणा की। पर बेचारे हनुमान के पीछे एक साया पड़ा था, या फिर ये कहे कि पुराने कर्मों की छाया। हालत ये कि आज हनुमान अपनी पूरी मेहनत के बाद भी आज खींवसर सीट बचाने के लिए संघर्ष करते दिख रहे है। बाला जी के घोटे की तरह उनके सर पर आसमान से जो चीज आ कर गिरी उससे आज हनुमान की हालत काटो तो खून नही जैसी है। बड़े भाई को चुनाव लडवाने और पत्नी के लिए सुरक्षित सीट ढूंढने के अरमानों पर बोतल का पानी कब लीक हो गया, पता भी नही चला।

हनुमान बेनीवाल तो खींवसर जीतने के लिए संघर्ष कर रहे है पर उनकों उम्मीद जायल में अनिल बारुपाल से भी ज्यादा नही करनी चाहिए। हबीबुर्रहमान के कांग्रेस में जाने के बाद बदले समीकरणों ने हनुमान की गणित को गडबड़ा दिया। हबीब तो एक बारगी निर्दलीय हो चले थे, पर साये के सरमाये ने उन्हे सही जगह पहुंचने में मदद की। जायल में अब बेनीवाल को युवा वर्ग का सहारा है जो वोट में कितना तब्दील होगा ये अभी कहना मुश्किल है क्योकि दलित इस बार अपना वोट जाया नही करने का मानस बना चुका है।

ये बात तय हो गयी है कि नागौर में हनुमान बेनीवाल का असर वही है जहां कांग्रेस औऱ भाजपा कमजोर है।

नागौर के बाहर अगर कही बेनीवाल की बोतल का ढक्कन खुलने की उम्मीद है तो वो है सीकर में जहां वाहिद चौहान को टिकट दिया गया है और नीम का थाना में जहां कांग्रेस के पूर्व विधायक रमेश खंड़ेलवाल बोतल निशान बुंलद कर रहे है। वैसे रमेश खंड़ेलवाल का बोतलों के धंधे से पुराना नाता रहा है। वाहिद चौहान ने पिछली बार सीकर में अच्छे वोट हासिल किये थे पर सीकर का मुसलमान भी दलितों की तरह अपना वोट कम से कम इस बार खराब नही करेगा। कोटपूतली में पूर्व विधायक रामस्वरुप कसाना भी अपने इलाके के दिग्गज माने जाते है औऱ जाट वोटों के टॉप अप के सहारे अपना रिचार्ज कराने की जुगत लगा रहे है। पूर्व विधायक प्रतिभा सिंह नवलगढ़ में शीशराम ओला के वोटों को सहेजने की कोशिश पिछले कई साल से कर रही है पर राजभोग हाथ नही लग पा रहा।

रिटार्यड़ आईपीएस विजेन्द्र झाला बिलाड़ा के चौराहे पर लस्सी मथ रहे है तो पूर्व विधायक कय्यूम खान मसूदा में फिर से चिकन चंगेजी बेचना चाहते है। जगन्नाथ बुरड़क के सामनें वैसे भी ज्यादा विकल्प नही थे इसलिए वे अपनी राजनीतिक विरासत बचाने के लिए लाड़नूं में बोतल में पानी भर रहे है। फुलेरा में स्पर्धा चौधरी से टिकट की दौड़ में कई दिग्गज कांग्रेसी एक बार तो पिछड़ गये थे पर विद्याधर की विद्या काम कर गयी। लक्ष्मी औऱ हरि का मेल सफलता दिला ही देता है। स्पर्धा टिकट का मुकाबला तो नही जीत पायी पर उनके टेलेंट का लोहा पूरा राजस्थान मान गया। स्पर्धा उभरती हुई नेता है औऱ ये बात यह है कि फुलेरा में कांग्रेसियों से सांभर के पानी के नमकीन और पकौड़े जरुर तलवा देगीं। कई सीटों पर, खासकर बाड़मेर में, बेनीवाल ने जाट-दलित कांबीनेशन बनाने का प्रयास तो किया है पर वो बोतल के पानी में आग लगाने का असफल प्रयास ही नजर आता है।

हनुमान बेनीवाल ने मेहनत करने में कोई कसj बाकी नही छोड़ी। पर ये चुनाव उनके राजनीतिक कद को तय कर देगा। बेनीवाल पर भाजपा की छाप भी कही ना कही उनके लिए काट का काम करती नजर आ रही है। वैसे दैवीय शक्ति का असर अब हनुमान पर इतना है कि उन्हे खरनाल में तेजा जी के साथ साथ उनकी आराध्य भुवाल माता की भक्ति भी मन से करने की जरुरत है। या, फिर किसी और देवी की शरण में चले जाये। हनुमान का कद कितना बढ़ेगा ये तो ग्यारह दिसम्बर को तय हो जाएगा पर क्या उनकी बनायी लंका बच पायेगी, ये बड़ा सवाल है। और, उत्तर एक ही है- होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

भाग प्रवाणै ही मिलै, देख दई को खेल…!

लंक भभीखण नै मिली, हड़ूमाण नै तैल..!!   

 

 

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