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ज्योति मिर्धा – विरासत की सीढ़ी से महत्वकांक्षा के भार की कहानी

खग वाहूं उलझै घणी, मैंगल रहिया घूम।

नणदल, ऊंची बांध दो, बाजूबंद री लूंम।।

राजनीति किसी युद्ध से कम नही और राजनीति के मैदान में जब योद्धा महिला हो तो देखने वालों की नजरे और नजरियां दोनों ही अलग तरह का होता है। राजस्थान की राजनीति में गायत्री देवी के जमाने से ही महिलाओं का बोलबाळा रहा है। गौरी पूनियां, कमला, सुमित्रा सिंह, गिरिजा व्यास, वसुंधरा राजे के बाद अगर सबसे मजबूत राजनेता के रुप में अगर किसी महिला नेत्री को देखा जाता है तो वो है ज्योति मिर्धा।

चुस्त कुर्ता-पायजामा, स्पोर्ट शूज औऱ बॉब कट बाल। चाल में फुर्ती औऱ शब्दों में वो तीखापन जो उनके समर्थकों के दिलों दिमाग पर छा जाता है। हालांकि ज्योति मिर्धा अब ज्यादा इलाके में नही आती पर नागौर के दिल का एक क़ोना अभी भी उनके दादा नाथूराम मिर्धा के लिए धड़कता है औऱ जिसमें ज्योति बसती है। 2009 के चुनावों से ठीक पहले ज्योति मिर्धा का नाम अचानक से उभरा। वोटिंग होने से पहले ही वे उसी दिन नागौर की सांसद बन गयी, जब स्वर्गीय नाथूराम मिर्धा की पत्नी केसर देवी उनके समर्थन में मंच पर आयीं। हालांकि वो सभा करीब तीन घंटे देरी से शुरु हुई और केसर देवी के मंच में आ जाने तक ज्योति मिर्धा के चुनाव प्रंबधकों की सांसे अटकी हुई थी। केसर देवी ने ज्योति के पक्ष में अपील की या नही, ये अभी भी नागौर में बहस का मुद्दा है।

ज्यां का ऊंचा बैसणा, ज्यांका खेत निवाण।

ज्यां का बैरी क्या करै, ज्यां का मीत दीवाण।।

ज्योति मिर्धा ने जयपुर के सवाई मान सिंह मेड़ीकल कॉलेज से 1996 में एमबीबीएस किया। पहली बार सुर्खियों में उनका नाम तब आया जब उनके कॉलेज में एड़मिशन को लेकर विवाद हो गया। उस जमानें में उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूल निवासियों के लिए कुछ सीटों को कोटा हुआ करता था। जानकारों का मानना है कि ज्योति मिर्धा के लिए उन्ही सीटों में से एक का प्रबंध किया गया। ऐसा संभव हो पाया क्योकि वो राजस्थान की राजनीति के दिग्गज नाथूराम मिर्धा की पोती थी। विवाद बढ़ने पर उसके बाद इस तरह के कोटा सिस्टम को खत्म कर दिया गया।

वे नाथूराम मिर्धा के पुत्र रामप्रकाश की बेटी है। मिर्धा के दूसरे पुत्र भानुप्रकाश ने 1990 के लोकसभा चुनावों में रामनिवास मिर्धा को हरा कर 1984 में हुई अपने पिता की हार का हिसाब बराबर किया। रामप्रकाश मिर्धा की पहली पत्नी का नाम कमला देवी था। रामप्रकाश मिर्धा ने बाद में वीणा से विवाह किया जो सूत्रों के मुताबिक अलवर के जाट बहरोड़ से थी। ज्योति मिर्धा उनकी बड़ी बेटी है, जिनका जन्म 1972 में हुआ। हेमश्वेता उनकी छोटी बहन है जिनका विवाह हरियाणा के हुड़्ड़ा परिवार में हुआ। ज्योति मिर्धा ने नरेन्द्र गैहलोत से नवम्बर 2000 में शादी की। नरेन्द्र, हरियाणा की पूर्व मंत्री कृष्णा गहलावत और बलवान सिंह के पुत्र है औऱ इंड़ियाबुल्स ग्रुप के मालिक है।

इन सब के साथ, यहां एक महत्वपूर्ण किरदार प्रेम प्रकाश मिर्धा भी है, जो कि डेगाना के पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा के बड़े भाई है। प्रेम प्रकाश मिर्धा ने मर्चेन्ट नेवी के अपने क़रियर के दौरान विदेश जाने वाले जहाजों में “सैकण्ड़ मेट” के रुप में कार्य किया है। प्रेम प्रकाश मिर्धा, इंड़ियाबुल्स ग्रुप की कई कंपनियों में निदेशक रह चुके है। 2004 के चुनावों में छोटे भाई रिछपाल मिर्धा का समर्थन ज्योति के लिए कितना कीमती था, ये उन्होने ही तय किया।

सांसद के रुप में अपने कार्यकाल में ज्योति मिर्धा ने गांवों के विकास के रास्ते खोलने की कोशिश की। नागौर के हर गांव में उन्होने 2004 से 2009 तक कम से कम दो बार दौरा किया औऱ समस्याओं को करीब से जाना। संसद में ट्रेक्टर ट्रॉली को व्यवसायिक वाहनों के लिस्ट से बाहर निकालने, मकराना के मार्बल के लिए जीआई टैग की मांग और रुस में भागवत गीता पर लगे बैन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उन्होने बेबाक रुप से उठाया। उनका सबसे पंसदीदा मुद्दा देश में दवाईयों की कीमत की पॉलिसी, ड़ॉक्टरों का कोड़ ऑफ कन्डक्ट औऱ ड्रग एप्रुवल पॉलिसी में झोल-झाल औऱ क्लीनीकल ट्रायल रहे। आम लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए उन्होने जैनेरिक दवाईयों को भी प्रोत्साहित किया पर सिस्टम में सुधार के लिए वक्त कम पड़ गया। पूरी शिद्दत से किये गये ज्योति मिर्धा के प्रयास भी “बुज्जी की भुर्जी” की तरह बेस्वाद रह गये।

ज्योति मिर्धा एक बार तो अपनी विरासत के कारण चुनाव जीत गयी। पर, 2014 तक लूणी में काफी पानी बह चुका था। बर्तन-भांड़ों की तरह बजते मिर्धा परिवारों के बीच ज्योति मिर्धा अपना पंसदीदा मैटेलिक म्यूजिक तलाश करने का प्रयास कर रही थी। नागौर की राजनीति बदल चुकी थी। मिर्धा परिवार की जगह नागौर की राजनीति में राम रघुनाथ चौधरी के परिवार का बोलबाला था। उनकी बेटी बिन्दु चौधरी, कांग्रेस का बहुमत होने के बावजूद, नागौर की जिला प्रमुख बन गयी औऱ बेटे अजय किलक ने ज्योति के चाचा औऱ सिपहसालार रिछपाल मिर्धा को ड़ेगाना में पटखनी दी थी। राजस्थान की जाट राजनीति पर वसुंधरा राजे और उनके गुर्गों ने कब्जा जमा लिया था औऱ नागौर में उनके दरबारी छोटू राम ताल ठोक चुके थे। ज्योति मिर्धा के सांसद रहते हुए भी मिर्धा परिवार को कुचेरा नगर पालिका पर कब्जा जमानें के लिए भी नाक से चने चबाने पड़े। सारी कडवाहट औऱ रस्साकशीं का लब्बोलुआब ये निकला कि 2014 में जब ज्योति मिर्धा अपनी राजनीति की पहली बड़ी परीक्षा से गुजर रही थी तब उनके चाचा रिछपाल मिर्धा मन से उनके साथ नही थे। ज्योति मिर्धा की हार का सबसे बड़ा कारण हनुमान बेनीवाल रहे, जिनके बढ़ते प्रभाव ने मारवाड़ में जाट राजनीति के सभी खूंटों को हिला रखा है।

पहली नही विचारियों, पाछे करै विचार।

मूंड़ मुंड़ाया, माल कह, पूछै लगन गंवार।।

2014 की हार बाद ज्योति मिर्धा को नागौर की राजनीति का केन्द्र होने के बावजूद हाशियें पर धकलेने की कोशिश की गयी। कांग्रेस की राजनीति की गहराई कम होने लगी औऱ बिना धणीं धोरी के दशकों तक नागौर में अनाथ फिरने वाले औऱ गलती से सांसद बने एक छुटभईयै नेता ने नक्कारखानें में तूती की तरह बजना शुरु किया। नतीजा ये कि आज वे अपने आप को जयपुर के कांग्रेस ऑफिस में अध्यक्ष के कमरे के सबसे बड़े रणनीतिकार होने का दावा करते है। ज्योति मिर्धा की इन महाशय से कभी कभार की नजदीकी का मैसेज ये गया कि वे सचिन पॉयलट के पाले के करीब है। इसका फायदा उन महाशय को हुआ जो ज्योति औऱ रिछपाल मिर्धा के बीच बढ़ती गहराई को देख अब ड़ेगाना से ड़ुबकी लगाने के सपने देख रहे है। नागौर को शायद उसका असली मुंगेरीलाल मिल ही गया।

नागौर की राजनीति आज जाट-राजपूत-दलित-मुसलमान का समीकरण ना हो कर, इन जाति और समुदायों के वर्चस्व की लड़ाई में बंट गयी है। पर क्या नागौर की राजनीति हमेशा से ऐसी ही थी? ज्योति मिर्धा की दादा नाथूराम 1952 से 1996 तक चार बार विधायक औऱ छह बार सांसद रहे। 1977 की जनता लहर के बीच कांग्रेस ने उत्तर भारत से केवल दो सीटे जीती, उनमें से नागौर एक थी। नाथू राम मिर्धा की राजनीति के किस्से आज भी नागौर की राजनीति में लोरी की तरह गाये जाते है।

आज मारवाड़ में जाट-राजपूतों के की लड़ाई जातीय संघर्ष में तब्दील हो रही है क्योकि राजनैतिक नेतृत्व में कमजोरी घर कर गयी है। वैमनस्य उस जमाने में भी था पर समर्थकों के लिए अपने नेता का आदेश सर्वोपरि होता था। 1980 में उम्मेद सिंह नागौर की ड़ीडवाना विधानसभा क्षेत्र से जनता दल के टिकिट पर चुनाव लड़ा। ड़ीड़वाना के जाट बोर्ड़िंग में खचाखच भरी सभा में नाथूराम मिर्धा ने जो शब्द कहे वो आज का कोई भी राजनेता बोलने की हिम्मत भी नही कर सकता। उन्होनें अपने समर्थकों से कहा, “मनै ठा है ओ उम्मेद सिंह सांप को बच्चियों है, पर म्हारां कहनां स्यूं ईने दूध पावनौ है”। ना कोई विरोध हुआ, ना कोई सवाल पूछा गया औऱ बाहरी प्रत्याशी उम्मेद सिंह ने जाट बाहुल्य ड़ीड़वाना से आसानी से चुनाव जीत लिया। नाथूराम मिर्धा का राजनीति में जाट राजपूतों की लड़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण था सामाजिक और राजनैतिक समीकरण। बात की गहराई औऱ समर्थकों पर पकड़ में नाथूराम मिर्धा के बराबर की लकीर राजस्थान की राजनीति में आज तक कोई नही खींच पाया।

नये पीढी के नेताओं को, भले ही जाट हो या राजपूत, ड़ाबड़ा कांड़ की सच्चाई को समझना होगा। मौलासर के पास ड़ाबड़ा गांव में चालीस के दशक में हुए एक गोलीकांड़ को ही राजस्थान में जाट औऱ राजपूतों के बीच लड़ाई की शुरुआत माना जाता है। ड़ाबड़ा में बहे खून का हिसाब तो आज भी चुनावी रैलियों में मांगा जाता है पर इस मामले में पूसाराम चौधरी औऱ जयनारायण व्यास की भूमिका पर अभी भी रिसर्च होना बाकी है। नागौर से चुनाव लड़ने वाला हर नेता ड़ाबड़ा जरुर जाता है, उन पुराने जख्मों को कुरेदने के लिए जिससे राजनीति के कोल्हू में चलती आम जनता का जोश ठंड़ा ना पड़े। ज्योति मिर्धा भी इस मामले ने उनसे अलग नही।   

नागौर में नाथूराम मिर्धा के किस्सों की सुनाने औऱ सुनने वालों के पास कोई कमी नही। “सड़क रो कांई करौ रे, सड़कां बनगीं तौ भैस्यां चौरने वाळों का खोज नी ळांधै” का तर्क हो या फिर बात हो बड़ी ही साफगोई से उस जमाने की महिला नेताओं को चुटकी काटने की, नाथूराम मिर्धा का स्तर अलग था। किस्सा मेड़ता का है जहां बलदेव राम मिर्धा की जयंति पर कई जाट दिग्गज इकट्ठा हुए। किसी बात के जवाब में नाथूराम मिर्धा ने गौरी पूनियां पर चुटकी ली कि “आ गौरी पूनियां, म्हें सारुं अलट-पळट अर देख ळी, आं कठै सैं ही गौरी कोणी”। मिर्धा के बयान के मतलब हजारों हो सकते थे, सभी लोगों ने बयान का अपना-अपना मतलब निकाला, हंसे औऱ बात दिल को लगाये बिना अपने अपने घर चले गये। आज ना वैसे लोग रहे जो बेबाकी से अपनी बात कह सके, ना ही ऐसे लोग रहे जो मजाक को मजाक के रुप में ले सके। इस तरह का बयान आज की छिछली राजनीति में भूचाल ला सकता है। पर उस जमानें में, नेता लीड़र हुआ करते थे औऱ लाख विवादों के बाद भी निर्विवाद बने रहते थे। राजनीति वास्तव में बदल गयी है पर अच्छाई की ओऱ नही।

राजस्थान की राजनीति में आने वाले दिनों में ज्योति मिर्धा की क्या जगह होगी वो 2018-19 के चुनाव तय करेगें। आज राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में विधायक बनने वालों की संख्या कम औऱ मुख्यमंत्री के पद के दावेदारों की संख्या ज्यादा है। जब कोई नागौर जिले का नेता हो औऱ उपनाम मिर्धा हो, तो व्यक्ति खुद भले ही जमीन पर रहे, पर मृगमरिचिका दिखाने वालों की कमी कभी नही होती। नागौर के मुंगेरीलाल भी ऐसे ही एक एक्सपर्ट है जो एक ही फिल्म दो लोगों को दिखानें में लगभग सफल हो गये है। उन्होने एक स्क्रीन सचिन पॉयलट के सामने लगा रखी है तो दूसरी मौका मिलने पर ज्योति मिर्धा को दिखाते है। मृगमरिचिका तो नागौर की गर्मी में आम बात है पर याद ऱखना ये जरुरी है कि पानी आज भी इस जमीन में गहराई पर बहता है। जाट राजनीति के पानी की बात करे तो वो वसुंधरा राजे के गुर्गे औऱ हनुमान बेनीवाल, ट्यूबवैल के जरिये बिना बिजली का बिल चुकाए, दिन रात निकाल रहे है। ऐसे में भविष्य की चिंता होना स्वाभाविक है। सचिन पॉयलट तो जमुना किनारे के है, वे मारवाड़ के पानी की गहराई वैसे भी सही से नही नाप पायेगें। खास बात ये कि पॉयलेट के करीबी मुंगेरीलाळ उनमें से है जो हलाल करने औऱ खाने में भी परहेज नही करते।

अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षाओं के बावजूद ज्योति मिर्धा ने नागौर से कुछ दूरी तो बनाई है पर अभी मैदान छोड़ा नही है। ये दूरी उनकी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। पिछले महीने उन्होने अपने समर्थकों के साथ एक मिटिंग जरुर की पर कोई खास नतीजा निकल कर नही आया। नागौर में अफवाह ये है कि ज्योति मिर्धा की नजर परबतसर विधानसभा क्षेत्र पर है क्योकि वे राजस्थान की राजनीति में अपनी जगह मजबूत करना चाहती है। खुद मिर्धा ने राजनीति में अपने भविष्य को लेकर सस्पेंस बनाये रखा है कि वो विधानसभा चुनाव लड़ेगीं या फिर सांसद बनना पंसद करेगीं। राजनीति से उनके दुराव के कई कारण हो सकते है जिनमें नागौर में मिर्धा परिवारों के आपसी कलह के चरम पर पहुचनें, रिछपाल मिर्धा के कांग्रेस में राजनीतिक भविष्य की अनिश्चितता से लेकर गहलावत परिवार औऱ नोटबंदी के बाद इंड़ियाबुल्स ग्रुप की आगे की रणनीति प्रमुख है। ज्योति मिर्धा अपनी राजनीति के लिए जो भी निर्णय ले, एक बात तय है कि नागौर के लोगों की आस का एक हिस्सा उनसे भी जुड़ा है।

सितम्बर का महीना नागौर के लिए महत्वपूर्ण रहेगा क्योकि 12 सितम्बर को परबतसर में ही कांग्रेस की संभाग स्तर की रैली होनी है। ऐसे में सारी नजरे ज्योति मिर्धा पर टिकी है कि क्या इस रैली में वो अपने पत्ते खोलती है या नही। ज्योति मिर्धा भले ही अपने पत्ते आखिर तक छिपा कर रखे पर उन्हे एक बात अपने समर्थकों को खुल कर बतानी होगी कि वे राजनीति की रेस का लंबा घोड़ा साबित होना चाहती है या फिर अपनी विरासत के बल पर सही मौके पर चौका लगाने में विश्वास रखती है। नागौर राजस्थान की राजनीति की धुरी है औऱ जब बात राजनीति की हो तो नागौर के लोग उडती चिड़िया के भी पर गिनने में माहिर है। ऐसें में सही समय पर सही निर्णय ही लूणी के पानी को अरब सागर तक ले जा सकता है।

लोहा लिपट्या काठ सूं, तैर रियां जल मायं।

वड्डा डूबन नायं दै, ज्यांकी पकड़ी बांय।।

 

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