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ज्योति या हडुमान – नागौर का जाट धर्म संकट में

मारवाड़ ने नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा, रामनिवास मिर्धा और रामरघुनाथ चौधरी जैसे दिग्गज नेता देखे है, पर जाट राजनीति में ऐसा संकट कभी नही आया। इस बार नागौर के जाट को अपना राजनीतिक भविष्य तय करना है। नागौर का जाट ये तय़ करेगा कि वो हनुमान बेनीवाल के संघर्ष के रास्ते को चुनना चाहता है या फिर ज्योति मिर्धा की विकास की राजनीति। उनको ये भी तय करना है कि उन्हे पैतींस कौम से बैर की राजनीति करनी है या फिर समरसता से सबको साथ ले कर राज करना है। जाट, मारवाड़ की सबसे बड़ी कौम है, ऐसे में उनको ये भी तय करना है कि क्या हनुमान बेनीवाल की कार्यशैली से वहां की दूसरी सबसे बड़ी कौम – दलित, उनके साथ आ पायेगा और आ भी गया तो क्या साथ रह पायेगा। पहली नजर में इन सभी सवालों का जवाब ज्योति मिर्धा ही है, पर फैसला छह मई को होगा और जाटों को ही करना होगा।

कुछ समय के लिए ऐसा लगा था कि राजस्थान की राजनीति का ध्रुव नागौर से बाडमेर की ओऱ खिसक रहा है। कारण ये कि जाटों ने वसुंधरा राजे को अपना नेता मान लिया और राजे ने वही किया जो इतिहास में मराठे करते आये है – कमजोर प्यादों पर हाथ रखना। हनुमान बेनीवाल की कलाबाजियों के कारण ही सही, पर नागौर के जाटों की राजनीति का भविष्य आज फिर से उनके हाथों में है औऱ उन्हे ही छह मई को अपने भविष्य का फैसला करना है।

हनुमान बेनीवाल औऱ ज्योति मिर्धा राजनीति के दो विपरीत ध्रुव है पर उनमें एक ही बात समान है कि दोनों ही जाट युवाओं के पसंदीदा है। ये बात अलग है कि बेनीवाल के प्रंशसक ज्यादा दिनों तक उनके साथ नही चल पाते, क्योकि लड़कपन से निकलते निकलते युवाओं को उनके छिछलेपन का अहसास हो जाता है। बेनीवाल की राजनीति विरोध पर आधारित है, चाहे वह वसुंधरा राजे का विरोध हो या फिर अशोक गहलोत का। उनके करीबी लोगो का कहना है कि अगर कोई मुद्दा हाथ में नही हो तो बेनीवाल बैचेन हो जाते है। जाट युवाओं के दम पर उन्होने पूरे राजस्थान में अपना नेटवर्क जरुर कायम किया है औऱ इसे पड़ोसी राज्यो जैसे हरियाणा में फैलाने की भी कोशिश की है। बेनीवाल जाटों की राजनीति करते है पर वे जाट समाज के नेता नही है। मतलब ये कि उन्हे जाटों के वोट तो चाहिए पर उनके मुद्दों को सुलझाने की जिम्मेदारी का भार कभी अपने कंधो पर नही लिया।

लब्बोलुआब ये कि जाटो में बेनीवाल को चाहने वाले युवा भी है तो उनसे दूरी बनाये रखने वाले सयाने लोग भी।

इसके बिल्कुल उलट, ज्योति मिर्धा की राजनीति मारवाड की जानी पहचानी अपणायत की लीक पर चल रही है। 2009 में उन्हे बाबा की पोती के रुप में मैदान में उतारा गया औऱ सांसद के रुप में उन्होने नागौर में काफी सक्रियता दिखाई। ज्योति मिर्धा की छवि उनके दादा नाथूराम मिर्धा की तरह ही खांटी जाट नेता की तो है पर दूसरे समाज खासकर राजपूतों में उनके खिलाफ कोई भावना नही है। दलित, मुस्लिम और ओबीसी की पहुंच भी ज्योति मिर्धा से सीधी है। हालांकि एक महिला की घरेलू जिम्मेदारियों के कारण उनका क्षेत्र से दूरी बना कर ऱखना काफी लोगों को रास नही आया था, पर इस तरह की स्थिती समझ से परे नही है।

जाट नेता की इमेज, दिल्ली में पकड औऱ अंग्रेजी अंदाज -ज्योति मिर्धा को नागौर का जाट नये जमानें में नाथूराम की छवि के रुप में देखता है।

वैसे सयाने जाटों का कहना है कि दोनो को अपनी अपनी जगह रहने दो। पर, ये स्थिती हनुमान बेनीवाल को मंजूर नही थी। भाजपा का दामन थामने का फैसला बेनीवाल का है, जिससे में 2019 में ही वे जाटों के एक-छत्र नेता स्थापित हो जाए। मिर्धा ब्रांड को नागौर से खत्म करना हाल फिलहाल बेनीवाल की राजनीतिक जिंदगी का लक्ष्य है। फैसला जाटो को करना है कि इक्कीसवीं सदी में वे हनुमान बेनीवाल को अपना लीड़र बनाना चाहते है या फिर ज्योति मिर्धा को।

राज, जो करसी विनरी हूंसी, आसी विण नूंती….।

आ नह किण रै बाप री, भगती अर रजपूती…।।

बात तो पुरानी है, पर सटीक है। राजस्थान में जाटों को राज करना आ गया क्योकि उनके नेता नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा औऱ रामनिवास मिर्धा जैसे थे। पर, बेनीवाल औऱ ज्योति की लड़ाई का सीधा असर इलाके के राजपूतों पर भी पड़ेगा। हालांकि राजपूतों ने दोनों से ही सुरक्षित दूरी बना कर रखी है पर दोनो में से एक को चुनने के प्रश्न पर राजपूतों की चाईस निश्चित रुप से बेनीवाल नही होगें। बेनीवाल की राजनीति का पौधा भाजपा में प्रकाश चंद ने लगाया था औऱ राजेन्द्र राठौड ने उसे समय समय पर सींचा। पर, उनकी राजनीति में ना ही नागौर के बणिया-ब्राह्मण या फिर राजपूत के लिए कोई जगह है।

राजपूत के साथ, ओबीसी का एक बड़ा वोट बैंक नागौर में भाजपा के साथ था। पर, धर्म संकट केवल जाटों के लिए नही है। मोदी लहर के बावजूद, ना केवल राजपूत बल्कि माली, सुधार, कुम्हार व अन्य अगड़ी औऱ पिछडी जातियों को भी ये निर्णय लेना होगा कि वे किसे नागौर का भविष्य का नेता देखना चाहते है। चाहने से भी काम नही चलेगा, छह मई को बूथ पर जाकर वोट की ताकत भी दिखानी होगी। खासकर, उन डेढ लाख माली वोटों को, जो अशोक गहलोत के ईशारे पर चलते है। बेनीवाल के भाजपा में जाने का सबसे बड़ा नुकसान जोधपुर में वैभव गहलोत को होने की संभावना है। ऐसे में अशोक गहलोत के एक इशारे पर नागौर में माली ज्योति मिर्धा के पक्ष में एक तरफा पोलिंग कर सकता है। नागौर में बेनीवाल के समर्थकों में निराशा का माहौल, पडोसी सीट जोधपुर पर वैभव को जिताने के लिए सीधा असर करेगा।

सूत्रों के मुताबिक बेनीवाल की उम्मीद से उलट ज्योति मिर्धा नयी परिस्थिती में ज्यादा खुश नजर आ रही है। उनका मानना है कि नागौर को आज या कल फैसला लेना ही था कि वहां का नेता कौन होगा। ऐसे में नागौर अपने भविष्य का फैसला क्यो ना 2019 में ही कर ले। हनुमान बेनीवाल के लिए खतरा इस बात का है कि ज्योति मिर्धा को चुनावी दंगल के किसी भी दांव पेच में कम नही आंक सकते। हालात दोनो के लिए ही नाजुक है पर ज्योति मिर्धा पर इस समय यही पंक्तियां ठीक बैठती है जो एक महिला योद्धा जीवन की एक कठिन लडाई में उतरने से पहले कहती है –

पग पग पाडू पाखरा, तुरी उलाळू तंग…।

जै सूरा री कामणी, जबर मचाऊं जंग..।।

जंग तो होगी औऱ दोनों में से एक ना एक योद्धा गिरेगा भी। छह मई अभी दूर है औऱ नागौर से उम्मीद यही है कि जाट हो,ऱाजपूत हो या फिर मुस्लिम, दलित या ओबीसी, अपने भविष्य का फैसला सोच समझ कर करे।

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