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दिव्या मदेरणाः खांटी जाट नेता बनने की कवायद में खाक होती विरासत

भरियां सौ छलके नही, छलकै सो आधा..!

माणस आही परख्यां, बोल्या अर लाधा…!!

मारवाड़ के युवा जाट को भले ही हनुमान बेनीवाल का तीखा और विद्रोही तरीके पसंद हो पर कोई अंदाज इन जवां दिलों पर राज करता है तो वो है – दिव्या मदेरणा का। बड़ी बड़ी बोलती आंखे और तल्ख आवाज, खांटी चौधरियों को परसराम राम मदेरणा की याद तो दिलाती है पर पुरानी निष्ठाएं अब समय के घुण के कारण खोखली हो चली है।

मेयो कॉलेज में पढ़ी दिव्या मदेरणा ने यूनिवर्सिटी ऑफ नाटिंगघ्घम से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है। अजमेर से जुड़ा ही उनके जीवन में एक पन्ना और भी है जिसके बारे में अब कोई बात नही करना चाहता। 2010 में राजनीति में उनकी सॉफ्ट लांचिग जिला परिषद के माध्यम से की गई थी। उनके पिता महिपाल मदेरणा 23 सालों तक जोधपुर में जिला प्रमुख रहे है। प्लान वैसा ही था जैसा कि उनके रिश्ते में भाई रघुवेन्द्र मिर्धा के लिए नागौर में बिछाया गया था। युवा चेहरों को जिला परिषद के माध्यम से लोगों से जुड़ने का मौका दो औऱ समय के साथ मदेरणा औऱ मिर्धा परिवारों के फॉलोअर उन्हे अपना नेता स्वीकार कर लेगे।

रामनिवास मिर्धा परिवार की राजनीति पर तो कांग्रेस ने इस बार फुल स्टॉप लगा दिया पर मदेरणा परिवार अभी भी नजरों में बना हुआ है।

कारण कोई सुखद नही बल्कि भंवरी देवी हत्याकांड़ है। 2011 में हुए भंवरी देवी हत्याकांड़ ने मारवाड़ की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। मारवाड़ के दो दिग्गज राजनीतिक परिवार इसकी चपेट में आये। तब से ही, महिपाल मदेरणा और मलखान विश्नोई अगली पैरोल के इन्तजार में दिन गिनते रहते है। दिव्या मदेरणा ने, खुद कई बार भवंरी देवी ह्त्याकांड़ को राजनीतिक साजिश बताया है और उन 152 सीड़ीयों की बात की है, जो उनके अनुसार अब गायब है। 152 सीड़ी की बात कितनी सही है यह कहना मुश्किल है पर राजस्थान कैड़र के तीन आईएएस भवंरी के इस भवंर में फंसने से जरुर बच गये।

सूत्रों की माने तो भवंरी देवी के हत्या के कुछ महीनों पहले, न्यूयार्क यात्रा के दौरान एक वरिष्ठ नेता ने महिपाल मदेरणा को भंवरी देवी से सुलह करने और मामले को सुलझाने की सलाह दी थी। पर किस्मत को कुछ और मंजूर था। आपराधिक तत्वों के माध्यम से मामले को सुलझाने का दांव उलटा पड़ गय़ा और खामियाजा भुगता महिपाल मदेरणा औऱ मलखान बिश्नोई ने। मामला अभी ट्रायल कोर्ट में लंबित है और अभियुक्तों की जमानत की कोई सूरत नजर नही आती। महिपाल मदेरणा, साठ के दशक में जयपुर में हुए दिलीप सिंह हत्याकाण्ड में भी अभियुक्त थे पर उस समय परसराम मदेरणा की राजनीति में तूती बोलती थी। उनका नाम ‘जांच’ के बाद केस से निकाल दिया गया।

भंवरी देवी हत्याकांड़ के बाद पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के कुछ सिपहसालारों ने मदेरणा परिवार से सहानुभूति को भुनाने के लिए लीला मदेरणा को कॉलेज के सुहाने दिनों की दुहाई दी औऱ भाजपा से जोडने की जुगत लगायी पर कामयाब नही हो सके। अशोक गहलोत ने महिपाल की पत्नी लीला मदेरणा और मलखान की अस्सी वर्षीय मां अमरी देवी को टिकिट दे कर यह संदेश देने की कोशिश की, कि राजनीतिक रुप से वे इन परिवारों के साथ है। लीला मदेरणा भले ही विधानसभा चुनाव हार गयी हो पर उन्होने क़ॉपरेटिव बैंक की राजनीति के माध्यम से गावों में अपने जुड़ाव को बनाये रखा। कुछ दिन पहले जब महिपाल मदेरणा पैरोल पर आये तो उन्होने भी अपने समर्थकों से लीला का ध्यान रखने का आग्रह किया था।

मारवाड़ के जाटों को मलाल है कि मदेरणा परिवार ने महिपाल को जेल से निकालने के लिए ज्यादा मेहनत नही की। पिछले पांच सालों के दौरान मां लीला मदेरणा और दिव्या के बीच रस्साकशी की अफवाह भी मारवाड़ की राजनीतिक गपशप का हिस्सा रही। जब टिकट बंटे तो अशोक गहलोत ने इस बार खुले रुप से लीला मदेरणा को टिकट देने औऱ मलखान विश्नोई के परिवार को लूणी से एड़जस्ट करने में पूरी ताकत लगायी। राहुल गांधी के युवा औऱ महिलाओं को आगे बढाने के अभियान में बाजी मारी दिव्या मदेरणा ने।

छोटे मोटे मुद्दों के अलावा, दिव्या मदेरणा के राजनीतिक करियर में अभी तक कोई बड़ा माईलस्टोन नही आया है। सामराउ कांड़ के बाद, खांटी जाट नेता बनने की कवायद में दिव्या मदेरणा जाटों के धरने में पहुंची पर ये कदम भैरांराम सियोल की बढ़ती लोकप्रियता को कांउटर करने का प्रयास ज्यादा था। सामराउ प्रकरण ने ओसियां की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। भैरांराम जो कि एक प्रोग्रेसिव जाट नेता के रुप में उभर रहे थे, उन्होने खांटी जाट राजनीति की राह पकड़ ली। दिव्या मदेऱणा के पास ज्यादा ऑप्शन नही थे। पर झटका दिया समझदार जाट समाज ने। समाज के लोगों ने हनुमान बेनीवाल की धुंआ उठाने के भाषणों को सिरे से नकार दिया औऱ सामाजिक समरसता का रास्ता चुना। नतीजा ये कि भैरांराम ने अपना आवरण उतार दिया था और दिव्या मदेरणा की राजनीतिक समझ के पहले दीदार आम लोगों को हो गये।

ओसियां के चुनावी मैदान की बात करे तो दिव्या मदेरणा औऱ सियोल के अलावा दो जाने पहचाने नाम – निर्दलीय महेन्द्र सिंह भाटी औऱ बसपा से ज्योतिका भाटी मैदान में है। ज्योतिका को दो हजार से ज्यादा वोट मिलने की संभावना नही है वही महेन्द्र सिंह भाटी भी अपना समय ही खराब करते लग रहे है। बसपा से कमजोर उम्मीदवार के चलते दलित अपना वोट वहां खराब नही करेगा, जिसका फायदा कांग्रेस को होगा। मुकाबला दिव्या औऱ भैरांराम के बीच ही रहेगा। ऐसे में दिव्या मदेरणा अपने आप को खांटी जाट नेता साबित करने में जुटी है। पर, जो स्टाईल उन्हे अपनी यूएसपी नजर आ रही है वो मारवाड़ के जाटों को अब रास नही आ रही। पुराने संबधों से बंधे जाट, मदेरणा परिवार को छोड़ना तो नही चाहते पर उन्हे भैरांराम के रुप में एक ऑप्शन जरुर मिल गया है। ऐसे में जाटों के वोट बंटने के बाद दिव्या मदेरणा की नैया पार लगाने का जिम्मा ओसियां के बीस हजार माली वोटों पर रहेगा। महेन्द्र सिंह भाटी का दावा है कि माली वोट उनके साथ है पर मारवाड़ में ही नही बल्कि राजस्थान में ये अनकहा सच है कि माली वोट वही जायेगा जहां अशोक गहलोत का इशारा होगा।

दिव्या मदेरणा के जीतने से अशोक गहलोत को सीधा राजनीतिक फायदा ये है कि भवंरी हत्याकांड के दौरान उन पर लगे सभी प्रकार के राजनीतिक आरोपों पर हमेशा के लिए विराम लग जायेगा। खास बात ये कि दिव्या मदेरणा के प्लान उनके नये बड़े बंगले की तरह होते है, जो बड़े तो है पर खाली है। ऐसे में मारवाड़ की जनता मौका मिलने पर खुद ही उनको तौल लेगी। आखिरकार राजनीति एक टेस्ट मैच है, ट्वन्टी ट्वन्टी नही।

भैरांराम सियोल की चुनौती को किसी भी मायने में कम नही आंका जा सकता। पर, हाल ही में सियोल और मदेरणा परिवार के रिश्तेदारी में जुड़ने के बाद, मारवाड़ में इन दोनों परिवारों को एक ही माना जा रहा है। ऐसे में दोनों में से चुनने की बात आने पर मारवाड़ का जाट बड़े नाम को ही चुनेगा जो कि दिव्या मदेरणा है। राजनीतिक परिवारों की नयी पीढी के लिए राजनीति में एन्ट्री आसान हो सकती है पर उम्मीदों का बोझ भी उतना ही ज्यादा होता है।

ऐसे में दिव्या मदेरणा के नाजुक कंधों पर बड़ा भार बस आने को ही है और अशोक गहलोत मुस्कुरा रहे है।         

 ऱोहिडो रंग फूटरो, फूल अजब सिर होय…!

आय पड्यों पण भोम पर, कलौं न वीणै कोय…

 

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