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नागौर को चुनना है: बेनीवाल-ब्रांड़ संघर्ष या बाबा की पोती ज्योति मिर्धा ।।

पावणा ने फलका खुवाना है, इंतजार करे। ज्योति मेरी बहन है, पर मायरा एक ही भरा जाता है। ज्यादा बेटी पीहर में अच्छी नही लगती।

ये कहना है हनुमान बेनीवाल का। नागौर के युवाओं के प्रतिनिधि होने का वे दावा करते है पर उनकी सोच अभी तक दकियानूसी ही है। जाट युवाओं के हीरों बेनीवाल अपने चुनाव प्रचार में गांव गांव कह रहे है कि नागौर की बेटी को परमानेन्ट ससुराल भेजना है। युवाओं की आंखो पर तो अवैध मांइसों और ट्रकों के धंधो का परदा पड़ा है पर क्या पूरा सफेद साफे वाला नागौर, बेनीवाल की इस तरह की सोच से इत्तेफाक रखता है या नही, ये लोकसभा चुनाव का नतीजा तय करेगा।।

हालांकि सच ये है कि ये लड़ाई राजनीतिक वर्चस्व की लडाई है। नागौर पर जो राज करेगा वो राजस्थान की राजनीति में सिरमौर रहेगा। अतंर ये है कि ज्योति मिर्धा ने ना तो अभी तक राजस्थान की राजनीति में दखल के बारे में सोचा है ना ही हनुमान बेनीवाल को दिल्ली जा कर मुद्दों की राजनीति करने सपना आया। ऐसे में हनुमान बेनीवाल की लड़ाई नागौर के गढ को जीतने की है ना कि नागौर के मुद्दों को दिल्ली की पंचायत में उठाने की।

नागौर के मुद्दों की बात करे तो हनुमान बेनीवाल अपने प्रचार के दौरान बोलते है कि उन्होने मंत्री पद को ठोकर मार दी और वे अब संतरी बन के सेवा करेगें। बेनीवाल का दावा है कि कर्जमाफी के मुद्दे की शुरुआत उनके द्वारा नागौर में हुई और उनका लक्ष्य पूरे भारत के किसानों का 82000 करोड का कर्जा माफ करवाने का है। बेनीवाल का फेवरेट मुद्दा है मुफ्त बिजली का। वे अपने समर्थकों से कहते है कि बिल आ गये तो भरना मत, वे माफ करवा देगे। उनका दावा है कि राजस्थान में बेरोजगारी भत्ता और बुजुर्गों की पेंशन, उनके प्रयासों का नतीजा है। वे वादा करते है कि लोकसभा चुनाव जीतने के बाद टोल मुक्त हाईवे के लिए संघर्ष करेगें क्योकि रोड टैक्स देते है तो टोल टेक्स नही देगें।

बेनीवाल का कहना है कि नेता उसको चुनो जो जीतने के बाद मिल जाए, मिस काल पर उपस्थित हो जाए। वे शान से बताते है कि उनके नाम पर गाने बने है क्योकि वे लडाके है और संघर्ष की राजनीति करते है।

दावों की सच्चाई पर गौर करे तो बुजुर्गो की पेंशन तो अशोक गहलोत ने अपनी पहली सरकार के समय ही शुरु कर दी थी। बेरोजगारी भत्ते का वादा भी कांग्रेस ने अपने मेनीफेस्टों में किया था। किसानों के लिए कर्ज माफी की बदौलत ही यूपीए की 2009 की सरकार सत्ता मे आयी थी और पीपीपी के जमाने में टोल मुक्त हाईवे संभव नही है।

जहां तक संघर्ष की बात है तो बेनीवाल ने संघर्ष खूब किया है। अशोक गहलोत के खिलाफ किया है, वसुंधरा राजे के खिलाफ किया है, ज्योति मिर्धा के खिलाफ किया है, भाजपा के खिलाफ किया औऱ कांग्रेस के खिलाफ भी किया है। जिला प्रशासन के अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों के खिलाफ किया है, बिजली-माईनिंग वालों के साथ किया है। युवा को संघर्ष की घुट्टी तो बेनीवाल ने पिछले पन्द्रह साल से पूरे राजस्थान में पिलायी है पर फिर भी विधानसभा चुनावों में सीटे केवल तीन जीत पाये। खींवसर के अलावा बाकी सीटे आरक्षित है और जाट समुदाय के वर्चस्व वाली रही है। ऐसे में बेनीवाल को जाटों की बीएसपी भी कहा जा रहा है।

दूसरी तरफ ज्योति मिर्धा के चुनावी फुलकों के साथ बात होती है पानी की। ट्रेक्टर पर बढे इंश्योरेन्स के खर्चे को कम कराने की, विकास के स्थानी मुद्दों की। ज्योति मिर्धा ना तो युवाओं को थाली में चांद दिखाती है ना ही नागौर के लोगों पर वादों की बरसात करती है। उनके चुनावी भाषण में उनके दादा की विरासत की बात होती है, उनके पहले कार्यकाल में किये गये काम की बात होती है और दिल्ली और जयपुर की कडी मिलाने की बात होती है।

बेनीवाल पर मिर्धा हमला तो बोलती है पर शब्द हमेशा सधे हुए होते है, पर वे स्पष्ट जरुर कर देती है कि उन्हे ना तो हनुमान बेनीवाल सुहाते है ना ही नागौर के युवाओं के जीवन को उजाडती उनकी राजनीति पंसद है।

बेनीवाल जोर दे कर जनता को बताते है कि ज्योति मिर्धा का नागौर में ना तो कोई घर है। उनका आरोप है कि ज्योति मिर्धा चुनाव जीत कर गायब हो जाएगी। मिर्धा का कहना है कि नागौर जिला कलेक्ट्रेट में सांसद का कार्यालय बनवाने का श्रेय उनको जाता है। ऐसे में आरोप प्रत्यारोप का दौर नागौर में जारी है, पर दोनों प्रत्याशियों के मानसिक लेवल में काफी फर्क नजर आता है।

फैसला नागौर को करना है कि क्या बेनीवाल का नाथूराम मिर्धा बनने का सपना पूरा हो पायेगा या नही, वो भी तब जब बाबा की पोती खुद मैदान में है।

नागौर में जाट अभी धर्मसंकट में है, खासकर खींवसर, जायल और नागौर के इलाके में। लाडनूं, नावां, ड़ीडवाना, परबतसर औऱ मकराना में ज्योति की लीड साफ नजर आती है। मुसलमान, दलित तो ज्योति मिर्धा के साथ पूरी तरह से थे ही पर जोधपुर में बेनीवाल की सभाओं के बाद नागौर का माली वोट भी बेनीवाल के खिलाफ लामबंद हो चुका है। राजेन्द्र राठौड़ के प्रेशर के बाद भी नागौर में राजपूत नेता बेनीवाल के खेमें में दिखने को पूरी तरह से तैयार नही है औऱ यही हाल मूल ओबीसी की जातियों का भी है जो परपरागत रुप से भाजपा का वोटबैक मानी जाती है। जानकारों का मानना है कि खींवसर को छोड़ कर ज्यादातर इलाकों में भाजपा का वोटर इस बार ज्योति मिर्धा को वोट करने का मन बना चुका है।

कहने वाले ये भी कहते है कि नागौर और जायल में दलित वोटों का कुछ हिस्सा बेनीवाल के खाते में जा सकता है। पर जमीनी हकीकत ये है कि 2019 के चुनावों में दलित किसी भी रुप में भाजपा या भाजपा समर्थित किसी भी उम्मीदवार को वोट देगा। ऐसे में बेनीवाल के पास आप्शन ये है कि दलित वोट करने ही नही आये। नागौर के जिला प्रशासन के लिए भी चुनाव एक चैलेंज से कम नही होगा क्योकि बेनीवाल के समर्थकों का हंगामा और बूथ कैप्चर के प्रयासों को भी नकारा नही जा सकता है।

रण तैयार है, फैसला बेनीवाल औऱ उनके समर्थकों को करना है कि क्या वे मुट्ठी भर बाजरे औऱ नाक की लड़ाई के लिए राजस्थान की सत्ता से दूर, दिल्ली में बैठकर मुद्दों की राजनीति करने को तैयार है या नही।

क्या संघर्ष की अफीम के बिना बेनीवाल को कब्ज की शिकायत नही होगी।     

 

 

 

 

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