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नाते की औरत सा व्यवहार हो रहा है मानवेन्द्र सिंह से

राजस्थान में नाता प्रथा को एक कुरीति माना जाता है। कुरीति होने के बावजूद सामाजिक स्तर पर कई जातियां नाता प्रथा को आज भी स्वीकार करती है और कई जातियों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। वैसे भी सामाजिक पंरपराओं की शुरुआत किसी समस्या के हल के लिए होती है और धीरे धीरे उनका रुप विकृत हो जाता है। कुरीतियों का विरोध करना सभी का कर्तव्य है पर पुरानी रुढिवादिता के उदाहरण देने से कई बार नयी स्थिती जल्दी समझ में आ जाती है।

राजनीति में नाता करने पर कोई रोक नही और बाड़मेर में मानवेन्द्र सिंह का कांग्रेस का दामन थामना भी नाता करने जैसा ही माना जा रहा है। जनेऊधारी ब्राह्मण की उपस्थिती में मानवेन्द्र सिंह ने पूरे कर्मकांड़ के साथ कांग्रेस में शामिल तो हो गये पर बाड़मेर में कांग्रेस परिवार के बड़े बूढों ने अभी तक मन से स्वीकार नही किया है। मानवेन्द्र सिंह और उनके करीबी दोस्त सचिन पायलेट ने इस नये नाते की खीर पूड़ी बांटने में कोई कसर नही छोड़ी पर दावत का आन्नद ज्यादातर मायरै वालों ने ही उठाया।

रविवार को जब मानवेन्द्र सिंह कांग्रेस में शामिल होने के बाद पहली बार बाड़मेर पहुंचे तो उनके स्वागत में वरिष्ठ नेत हेमाराम चौधरी और पूर्व सांसद हरीश चौधरी शामिल नही थे। शिव से पूर्व विधायक अमीन खान भी अनमने ढंग से कवास और बाड़मेर के कार्यक्रमों में पहुंचे।

खासबात ये कि मानवेन्द्र सिंह ने बाड़मेर पहुचने पर बड़ी घोषणा कर दी कि उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव नही लड़ेगा। मानवेन्द्र सिंह की यह घोषणा उनकी पत्नी चित्रा सिंह से ज्यादा छोटे भाई भूपेन्द्र को नागवार गुजरेगी क्योकि वे पचपदरा से चुनाव लड़ने की आस लगाये बैठे थे। पहले भी, मानवेन्द्र ने छोटे भाई से किनारा कर रखा था पर मां शीतल कंवर के कहने पर भूपेन्द्र सिंह को अभी तक साथ रखा गया।

रफ्ता रफ्ता, बड़ी समझदारी से मानवेन्द्र सिंह ने स्वयं को अपनी राजनीति का केन्द्र बिन्दु बना लिया है।

ऐसे में जिस राजपूत समाज को मानवेन्द्र सिंह से नेतृत्व की उम्मीद थी वह अब ठगा सा महसूस कर रहा है। सयाणै ठाकर पहले ही कह चुके है कि उनका मकसद उसी दिन पूरा हो गया जब मानवेन्द्र सिंह ने भाजपा को छोड़ दिया।

ऐसे में बाडमेर की राजनीतिक जमीन पर सब अपना सोगरा सेकनां चाहते है। पर जो बाजरे के स्वाद के आदि नही उन्हे कब्ज हो सकती है। वैसे सचिन पायलट को बाजरे का खीचड़ा पंसद तो है पर बाजरे की राजनीति शायद रास नही आये। हमें तो उनके विंटर लंच का इंतजार है जिसके मैन्यू मे बाजरे का खीचड़ा जरुर होता है।   

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