You are here
Home > Rajasthan > Politics > मगरा क्षेत्र – राजनीति के भागीरथ की अनवरत तलाश में

मगरा क्षेत्र – राजनीति के भागीरथ की अनवरत तलाश में

भाजपा और कांग्रेस की चुनावी जंग का बिगुल राजस्थान में बज चुका है। जातियों के समीकरण और उन पर आधारित दावेदारियों की बहस अब पार्टी दफ्तरों, नेताओं के घरों और चाय की थड़ियों पर लड़ते पत्रकारों के बीच अनसुनी करने के बावजूद भी सुनाई दे ही जाती है। पर राजस्थान का एक ईलाका ऐसा है जहां की राजनीति का कोई धणी-धोरी नही। अस्सी के दशक तक ये इलाका कट्टर कांग्रेसी रहा पर फिर एक अदना मास्टर की मेहनत ने कमल की जड़ों को इतना गहरा पहुंचाया कि आज भी कई हाथ मिलकर उसकी जड़े ना खोद पाये। य़े बात अलग है कि भैरों सिंह शेखावत की छत्रछाया में जिस कीचड़ में वो कमल खिला था वो आज राजनीतिक प्रदूषण के कारण बास मार रहा है।

यहां बात हो रही मगरा क्षेत्र की। राजस्थान के केन्द्र में बसा यह इलाका अजमेर, राजसमंद, पाली, भीलवाड़ा जिलों में फैला है और उदयपुर तक इस इलाके के बाशिन्दे काफी संख्या में है। इलाके के शहरी इलाकों जैसे ब्यावर, भीम, रायपुर, देवगढ़ में वर्चस्व जैन समाज का है वही ग्रामीण इलाकों में रावत और दलित भारी संख्या में है। रावत समाज से ही निकला एक तबका जिसने मुस्लिम आक्रांताओं के समय जबरन इस्लाम को कबूला पर मजबूरी नही रहने पर फिर से सनातन धर्म की ओर लौट आया वो मेहरात कहलाता है और जिन्होने अपनी मूल पहचान को इस्लाम के सैलाब मे खो दिया उन्हे काठात कहा जाता है।

रावतों की राजनीति पर समय जाया करना बेमानी है पर विधानसभा वार मगरा क्षेत्र को देखने पर इलाके की राजनीति और रावतों के भविष्य की तस्वीर साफ हो जाती है। साठ के दशक में मेजर फतह सिंह ब्यावर से विधायक रहे और उनके पुत्र लक्ष्मण सिंह भीम से कांग्रेस के विधायक व गृह राज्यमंत्री रहे है। भीम से चुनाव लड़ने और अपने कुनबे को आगे बढाने के जनकल्याणकारी उद्देश्य के अलावा अभी तक इनकी राजनीति को कोई भी समझ नही पाया। गिरिजा व्यास के गोदी से निकल कर लक्ष्मण सिंह ने अब सचिन पायलट का दामन थाम रखा है। पर कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज अशोक गहलोत और सीपी जोशी दोनों ही लक्ष्मण सिंह को ज्यादा पसंद नही करते। सचिन पायलट को भी ऐसे ही किसी रावत की तलाश थी जिसे में सजावट के तौर पर अजमेर लोकसभा क्षेत्र में इस्तेमाल कर सके।

इस परिवार की तीसरी पीढ़ी अब राजनीति में अपना भाग्य आजमानें के लिए लालायित है। इलाके के मांइस बिजनेस में इनके लंबे और एकाधिकार पूर्ण दखल ने माया तो खूब बरसायी है पर राजनीतिक उंचाई पाने के लिए जो आदरभाव कमाना पड़ता है, उससे वे काफी दूर है।

रावतों की राजनीति का सबसे बड़ा नाम रासासिंह रावत है। राजसमंद जिले के ड़ूंगा जी के गांव का ये गुदड़ी का लाल पढ़ने के लिए रोज दस किलोमीटर पैदल चल कर भीम आया करता था और मुफलिसी इतनी कि दसवीं कक्षा में आने से पहले कभी चप्पल तक नही पहनी। रासासिंह रावत भाजपा की राजनीति में उन लोगों में से एक है जिन्हे भैरोंसिंह शेखावत ने जनसंघ के समय से साथ रखा और आगे बढ़ाया। रावत ने पहला चुनाव भीम से लड़ा पर प्रख्यात लेखिका लक्ष्मी कुमारी चूंड़ावत के सामने टिक नही पाये। 1989 में राम लहर से भाग्य का छीकां छूटा और रासासिंह रावत अजमेर लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद रहे। लेखिकाओं का उनकी राजनीतिक कुंड़ली में छत्तीस का आंकडा था और यही कारण है कि कवयित्री प्रभा ठाकुर के सामने उन्हे एक बार अजमेर से हार का सामना करना पड़ा।

रासासिंह ने अपना आखिरी चुनाव 2009 में राजसंमद से लड़ा पर मगरा क्षेत्र में वोटिंग का आंकड़ा पच्चीस प्रतिशत के करीब ही रहा। नतीजा ये हुआ कि रासासिंह तो चुनाव हारे ही, पर मगरा क्षेत्र ने राजसमंद सीट पर अपना दांवा भी हमेशा के लिए खो दिया। रासासिंह रावत के पास गिनाने को राजनीतिक उपलब्धियां भले ही ना हो पर उनके नाम पर विरोधी भी आज तक अंगुली नही उठा पाये। राजनैतिक जीवन की शुचिता ही रासासिंह रावत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

रासासिंह रावत के मंझले पुत्र तिलक सिंह रावत इस बार ब्यावर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकिट पर दावेदारी कर रहे है।

ब्यावर के विधायक शंकर सिंह रावत, जो कि एक मेहरात है, भाजपा के कुनबे को एकजुट रखने में इस बार नाकाम रहे। भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के आरोपों के बीच विधायक शंकर सिंह ने ब्यावर की राजनीति में रावत के खिलाफ मेहरात समीकरण बनाने की कोशिश की। यही समीकरण बनाने के फेर में उनकी राजनीति की नैया चक्करघिन्नी हो गयी। देवेन्द्र सिंह और महेन्द्र सिंह भी भाजपा के टिकिट पर ब्यावर से दावेदारी कर रहे है। पिछले तीस सालों से ब्यावर से दावेदारी कर रहे सुरड़िया के किशन महाराज भी आखिरी बार अपना प्रयास करने में लगे है।

भीम विधानसभा क्षेत्र में इस बार मुकाबला कड़ा होने की पूरी संभावना है। हरि सिंह रावत, जो किसी जमाने में लक्ष्मण सिंह के लक्ष्मण हुआ करते थे, आज भीम के हरि बने हुए है। तीन बार लगातार चुनाव जीत कर हरि सिंह ने अपनी राजनीतिक योग्यता तो साबित कर ही है पर उनका भविष्य हर चुनाव में दांव पर लगा रहता है। काछबली के भोपालसिंह, जो कि प्रसिद्ध इतिहासकार प्रेमसिंह चौहान के पुत्र है, अपनी पत्नी के साथ दावेदारी कर रहे है। पूर्व सांसद गोपाल सिंह ईड़वा का इस परिवार को वरदहस्त प्राप्त है पर ईड़वा की राजनीति अब सचिन पायलट के कमरे तक सीमित है, जहां कम से कम भीम के संदर्भ में उनसे चर्चा नही की जाती।

मगरा क्षेत्र का तीसरा महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र जैतारण है जो पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष हीरासिंह चौहान के निधन के बाद अनाथ सा हो गया है। भाजपा के विधायक और मंत्री सुरेन्द्र गोयल इलाके के वोटों को अपनी जेब में समझते है वही कांग्रेस, रायपुर के ठाकरों की तरह, मगरे में कदम रखने से झिझकती आयी है। जैतारण में पच्चीस हजार रावत वोट अभी भी किसी धणी धोरी को तलाश रहे है जो उनका राजनीतिक सरमायां बन सके। पर रावत नेताओं की नजर ब्यावर के छींके पर रहती है जो उन्हे सरल नजर आता है। हीरा सिंह चौहान ने तीन बार चुनाव जीता और तीनों बार संघर्ष करके जीता।

जैतारण का इतिहास गवाह है कि रावत – मेहरातों की एकता ही यहां उनके लिए राजनीतिक सफलता का रास्ता खोल सकती है। जैतारण में गधा-भाटा फिर से गाड़ने का समय तो आ चुका है पर कोई सवार अभी तैयार नही हो पाया है।   

2013 के विधानसभा चुनावों में रावतों का एक और सितारा सुरेश रावत के रुप में पुष्कर से उभरा। 27 साल के इस युवा में राजनीति के सारे गुण तो थे पर ज्यादा पैतंरेबाजी के चक्कर में वे आज विधायक होते हुए भी अपना टिकिट बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है। उनके भाई कुंदन सिंह रावत, अजमेर में सचिन पायलट के सिपहसालारों में से एक है वही श्रवणसिंह जैसे पुराने चावल भी अभी तक राजनीति में जोर आजमाईश से पीछे हटने को तैयार नही। वकील अशोक सिंह ने पीसांगन की प्रधानी पर किसी तरह से जुगाड़ तो बिठा लिखा पर पुखराज पहाड़िया के पाश में जीना और दो कदम चल पाना आसान काम नही। खैर, इन्होने अपनी कुव्वत से ज्यादा समय रहते पा लिया, इसके लिए ख्वाजा का शुक्र मनाये। रही बात मदन सिंह रावत की, वे तो नसीराबाद की राजनीति के ध्रुवतारा है। वे वही है जहां थे, और वही रहेगें जहां है। अजमेरा में रावतों की राजनीति की कमजोरी उस समय साबित हो गयी जब हाल ही में कोटड़ा इलाके में रावतों के मकानों को सरे आम तोड़ दिया गया और कोई भी नेता उन्हे बचा नही पाया।

वैसे तो रावतों का सीधा दांवा पुष्कर, नसीराबाद, ब्यावर, भीम और जैतारण विधानसभाओं पर बनता है पर मारवाड़ जंक्शन और सोजत में भी भारी संख्या में रावत वोटर मौजूद है पर 2018 में राजनीति का फोकस ब्यावर, भीम और पुष्कर पर ही रहेगा। सुरेश सिंह को अपनी राजनीति में परिवक्वता लाने की जरुरत है वही ब्यावर से तिलक सिंह रावत नये सितारे साबित हो सकते है। लक्ष्मण सिंह और हरिसिंह का पारिवारिक मुकाबला इस बार भी जारी रहेगा वही जैतारण में रावतों को एक और शेरे-ए-मगरा की तलाश रहेगी।

Leave a Reply

Top