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मानवेन्द्र सिंह –  कड़क कॉफी के प्याले में उठे तूफान की नियति बीड़ी के धुंए में उड़ जाना है

कई लोगों के ये नही पता होगा कि जसवंत सिंह ने कभी बाड़मेर से कोई भी चुनाव नहीं जीता। बाड़मेर में अब जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह एक राजनीतिक तूफान पैदा करना चाहते है। साल 2014 के आम चुनाव के दौरान बाड़मेर में जसवंत सिंह ने अपनी पार्टी के आदेश को खारिज कर दिया था, जिसके वे एक संस्थापक सदस्य थे। जसवंत सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और देश की अगड़ी राजनीतिक पार्टियों के लगभग छक्के छुड़ा दिये। जसवंत सिंह चुनाव तो नही जीत सके पर उन्होने बाड़मेंर की राजनितिक जमीन हमेशा के लिए बदल दी। जातीय ध्रुवीकरण के नये रुप का जो दौर मालाणी के इलाके में 2014 में शुरु हुआ, उसने जातियों के बीच की खाई को अविश्वसनीय रुप से गहरा कर दिया। अगर जसवंत सिंह के नेत़ृत्व में राजपूत, दलित, मुसलमान औऱ पिछड़ी जातियां लामबंद हुई, वही दूसरी ओर जाट समाज में भी जसवंत सिंह को हराने के लिए पार्टी लाइनों, विचारधाराओं और पारिवारिक निष्ठा को धुंधला कर दिया। जसवंत सिंह करीब 80000 वोट से चुनाव हार गये औऱ उनके विधायक पुत्र मानवेन्द्र को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्काषित कर दिया।    

चार साल बाद, अब फिर से बाड़मेर की राजनीति उबाल खानें को बेकरार हो रही है। किरदार ज्यादातर वही है पर इस बार जसवंत सिंह मैदान में नही है। मानवेन्द्र सिंह, हालांकि 2004 में बाड़मेर से सांसद रहे है और हाल फिलहाल शिव विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के  विधायक है, पर बाड़मेर की राजनीति में मानवेंद्र सिंह, जसवंत सिंह के पुत्र हैं। अंग्रेजीदा पिता से इतर शार्ट कुर्ता, धोती औऱ मारवाड़ी पगड़ी की पोशाक में मानवेन्द्र सिंह ने शुरु से ही अपनी छवि अलग बनाने की कोशिश की है। मानवेन्द्र सिंह को उनके करीबी दोस्त मग्गू के नाम से पुकारते है औऱ हेरिटेज होटलों में अपने साथियों के साथ कड़क काली क़ॉफी औऱ बीड़ी की जुगलबंदी उनके पसंदीदा शगल है। पर करीब से जांचने पर, मानवेन्द्र की छवि और अंदाज ना तो बाडमेर की जनता से मेल खाता है औऱ ना ही उनके कट्टर समर्थकों से। उनको जानने वाले सभी का विचार यही है कि वे अलग है और मुस्कुराहट में दिखाई देने वाली मारवाड़ की अपणायत भी सतही है।

जसवंत सिंह ने जसोल में अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ ओसियाँ के मोहन सिंह भाटी की बेटी शीतल कंवर से शादी की थी। जसवंत सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव भी राम राज्य पार्टी के टिकिट पर अपने ससुराल ओसियां से 1972 से लड़ा और हार गये। बाडमेर में उनके पिता औऱ परिवार ने इस चुनाव में उनकी मदद में आगे आने से यह कह कर इंकार कर दिया कि वे लोग सगों के क्षेत्र को प्रभावित नही करना चाहते। जसवंत सिंह ने अपने पिता सरदार सिंह, जो कि एक पूर्व उत्पाद शुल्क आयुक्त थे, की इच्छा के खिलाफ सेना की नौकरी छोड़ी औऱ एक समय पर जोधपुर में गाय पालन कर जीवन गुजारनें का फैसला कर लिया था। जबकि उनके चचेरे भाई हनुत सिंह आगे चल कर भारतीय सेना के महानायकों में से एक बन गए।

भाग्य को कुछ औऱ मंजूर था। समय ने करवट ली औऱ अपनी किस्मत औऱ कर्म के सहारे जसवंत सिंह भारतीय राजनीति के एक चमकते सितारे साबित हुए। भाग्य से, शीतल कंवर की चार बहनों में से एक का विवाह संभाजी राव आंगरे, जिन्हे सरदार आंगरे के नाम से जाना जाता है, से हुआ जो कि ग्वालियर की राजमाता विजया राजे सिंधिया के करीबी सहयोगी थे। यहां से, विजया राजे सिंधिया और उनके माध्यम से अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जसवंत सिंह का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। जसवंत सिंह को हाल में उनके बेटे मग्गू ने ‘वाजपेयी के हनुमान’ के रूप में वर्णित किया था पर उन्होने भैरोसिंह शेखावत को कोई भी पदवी उन्हे उचित नही समझा।

विजया राजे सिंधियां के सहयोग को जसवंत सिंह औऱ उनका परिवार नकार नही सकता। पर, राजनीति में हर दिन नये समीकरण ले कर पैदा होता है। वक्त ने करवट बदला और दशकों बाद जसवंत सिंह जब वाजपेयी केबीनेट में विदेश मंत्री बने तो वसुंधरा राजे उनकी मातहत थी। यही से एक नया समीकरण शुरु हुआ शीतल कंवर और वसुंधरा राजे के बीच जो बाद में वाक् युद्ध में बदल गया। शीतल कंवर उस समय ब़ॉस की बीवी थी औऱ वसुंधरा राजे अब खुद ब़ॉस है।  

साल 2014 का चुनाव भारतीय राजनीति में तो ऐतिहासिक था ही पर बाडमेंर की राजनीति के लिए भी अभूतपूर्व साबित हुआ। मालाणी में समाज जातिगत रुप से जिस तरह विभाजित हुआ, ऐसा पहले कभी नही हुआ था। जसवंत सिंह अब अपनी अस्वस्थता  के कारण राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। लेकिन उनके बेटे मानवेंद्र सिंह और उनकी पत्नी चित्र सिंह अपने बीमार राजनीतिक कैरियर की बिसात बिछाने के लिए, शैया पर पड़े जसवंत सिंह की छवि का पूरा उपयोग करने में लगे है। मानवेन्द्र सिंह भाजपा से बगावत करने के किनारे पर है औऱ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उन्हे विरोधी की तरह देखती है। 2014 के बाद बाड़मेर और जैसलमेर में अविश्वास के वायुमंडल ने कई घटनाओं को जन्म दिया और समुदायों के बीच संघर्ष की स्थिती का कारण बना। वसुंधरा राजे की रणनीतियों ने समुदायों के बीच रुखेपन को औऱ बढाया औऱ सभी पक्षों के राजनेताओं के लिए एक खुशहाल स्थिति करने में पूरा योगदान दिया।

आज मानवेंद्र सिंह वसुंधरा राजे के खिलाफ एक बाग़ी है। उन्होंने राजस्थान गौरव यात्रा से परहेज किया और 22 सितंबर को स्वाभिमान रैली में एक प्रमुख राजनीतिक घोषणा कर सकते हैं। राजनीतिक मजबूरियों के बावजूद वे ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस में अपने पुराने दोस्त सचिन पायलट की छतरी में जा सकते है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर मानवेंद्र कांग्रेस में शामिल हो जाते है तो बाड़मेर की राजनीति में उनका क्या वजूद होगा?

बाड़मेर जिले के सात विधानसभा क्षेत्र, जैसलमेर और पोकरन की विधानसभा सीटें और बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट के जातीय समीकरणों में इस यक्ष प्रश्न का जवाब छिपा है। शिव, जहां से मानवेंद्र खुद विधायक हैं, एक मुस्लिम-राजपूत वर्चस्व वाली सीट है। बाड़मेर पर जाटों का प्रभुत्व है लेकिन कांग्रेस पार्टी के एक जैन ने जाट विरोधी भावनाओं कर पिछले कई सालों से अपना मजमां जमा रखा है। बायतु स्पष्ट रूप से जाट वर्चस्व वाली सीट है, पचपदरा ओबीसी है, गुडा मालानी कलबी-जाट है और चोहटन में सिंधी मुसलमानों का दबदबा है। जैसलमेर और पोकरन विधानसभा सीट पर राजपूत-मुस्लिम वर्चस्व की लड़ाई में उलझे है वही सीमा पार पाकिस्तान के विभिन्न धार्मिक स्थल भी इलाके की राजनीति पर सीधा प्रभाव रखते है। 2014 में जाट और कलबी भाजपा के सोनाराम के पक्ष एकजुट हुए और 4.88 लाख वोट जुटाए। जसवंत सिंह ने भी बहादुरी से चुनाव लड़ा औऱ लगभग 4 लाख लोगों का समर्थन इकट्ठा किया। इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि जाट बाड़मेर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में सबसे हावी और राजनीतिक रूप से सबसे सक्रिय जाति समूह है।

मानवेंद्र सिंह के लिए चुनौती यह है कि क्या वो भाजपा या कांग्रेस के लिए बाड़मेर लोकसभा जीतने के लिए जाट विरोधी भावनाओं को उस सीमा तक पहुंचाने में सक्षम होंगे जो कि उन्हे चार लाख से ज्यादा वोट दिला पाये। बड़ी चुनौती प्रमुख  राजनैतिक दलों- भाजपा और कांग्रेस, के लिए होगी जो जाटों की राजनीतिक शक्ति के खिलाफ मानवेन्द्र पर दांव लगाने की हिम्मत करेगें।

लेकिन राजनीति ताश के पत्तो का खेल है जहां खेल हर दांव पर बदलता है। बाड़मेर में वसुंधरा राजे के लिए जनता की भावना किसी से छिपी नही है। ऐसे में मानवेन्द्र सिंह का भाजपा के विधायक के रुप में शिव या अन्य किसी सीट से जीतना टेढी खीर नजर आता है। यदि मानवेन्द्र पाला बदल लेते है तो उनके कांग्रेस का विधायक बनने की संभावना कम ही नजर आती है। कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में 2019 के लोकसभा चुनावों में भी वे अपने पिता का जलवा दोहरा पाये इसकी संभावना कम है क्योकि मोदी-शाह की जोड़ी राजस्थान में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीट जीतने के अपने भागीरथी प्रयासों में कोई कसर छोड़ने की गलती नही करेगी। अगर मानवेन्द्र सिंह भाजपा नही भी छोड़ते है तो उनकी स्थिती में ज्यादा सुधार की गुंजाईश नही है क्योकि पीर पगारों के आशीर्वाद के बावजूद लोकसभा में भाजपा के उम्मीदवार के रुप में वे अपने पांरपरिक मुस्लिम वोट को मोदी की पार्टी को दिलावाने में सफल नही हो पायेगे।

मानवेन्द्र सिंह की स्वाभिमान रैली ने राठौड़ी तलवारे म्यांन से बाहर निकलवा दी है औऱ उनका बिना रक्त औऱ रक्स किये वापस जाना मुश्किल लगता है। ऐसे में मानवेन्द्र सिंह, भाजपा के लिए सरदर्द बढा सकते है पर उनकी भूमिका घनश्याम तिवाड़ी से ज्यादा अलग होने की संभावना कम ही नजर आती है। मानवेन्द्र सिंह का अब भाजपा की छतरी में रहना आसान नही, वही मालाणी में कांग्रेस उनके कद को संभाल पाने के लिए तैयार नही लगती।

ऐसे में किसी ने सही कहा है कि राजनीति में राजा कब रंक हो जाने का फैसला भाग्य के हाथ नही बल्कि कर्मों के हाथ होता है।   

 

 

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