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मारवाड़ में मोदी लहर बनी मृगमरिचिका

मारवाड़ के लू के थपेड़ो औऱ  राजनीति के गहरे बहते पानी के बीच मोदी लहर ठंडी सी पड गयी है। मारवाड़ की पांच लोकसभा सीटों में से तीन पर मोदी लहर का असर केवल मृगमरिचिका बन चुका है। यानि दिखाई तो दे रहा है पर वास्तविकता में है नही। मारवाड़ में अगर कोई लहर दिख रही है तो वो है अशोक गहलोत के तूफानी दौरों की और दूसरी वसुंधरा राजे के आंख के ईशारे की।

शुरुआत नागौर से करे तो राजस्थान की राजनीति की धुरी कहलाए जाने वाले नागौर पर मोदी लहर का असर ना के बराबर है। भाजपा को भी इस बात का अहसास था इसलिए चाणक्य कहलाये जाने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने हनुमान बेनीवाल के सामने सर झुका दिया। परिणाम ये, कि भाजपा का मूल वोट बैंक राजपूत और ओबीसी अपने का ठगा सा महसूस कर रहा है और ज्योति मिर्धा की साफ छवि के चलते कांग्रेस की तरफ रुख करने का मानस बना चुका है। मूल भाजपाई नागौर में निराश है औऱ चाहता है कि टायर गोदाम में ही पड़े रहे और उस पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया जाए। अमित शाह के कंधे पर बंदूक चलाते हुए राजेन्द्र राठौड की राजनीति को भी स्थानीय नेताओं अपने लिए खतरे की तरह महसूस कर रहे है।

राजेन्द्र राठौड़ को आसान सीटों पर अपने आदमी फिट करने में महारत हासिल है।

ऐसे में बेनीवाल के टायर पर सवार राठौड ने नागौर भाजपा में कई लोगों की नींदे उड़ा रखी है। नागौर की राजनीति में अगर राजेन्द्र राठौड इस बार सफल हो जाते है तो इसका पहला असर यूनुस खान के ड़ीडवाना औऱ लाडनूं में दबदबे पर होगा, दूसरा मानसिंह किनसरिया की परबतसर और गजेन्द्र सिंह खींवसर की लोहावट सीट पर। यही कारण है कि वसुंधरा राजे इस बार नागौर की सीट पर खास नजर बनाए हुए है, वही स्थानीय पहलवानों की गुत्थमगुत्था में मोदी लहर का नामोनिशान नजर नही आ रहा।

जोधपुर सीट के कुछ इलाकों पर मोदी लहर का असर निश्चित रुप से दिखाई देता है। कमल के निशान औऱ गजेन्द्र सिंह शेखावत की मिलनसारिता के कारण भाजपा अभी भी मैदान में टिकी हुई है। जोधपुर शहर में अशोक गहलोत का दबदबा है और यही कारण है कि शेखावत के चुनावी दोरों का फोकस पोकरण औऱ शेरगढ इलाके है। पोकरण में गजेन्द्र सिंह को जो भी लीड़ मिलने की आस है पर वो इलाके के मुस्लिम वोटों के कारण काउंटर बैलेंस है। सीमा पार से पीर पगारों की दरगाह का संदेश इस बार कांग्रेस के लिए आयेगा क्योकि पोकरण में सिंधी मुसलमान वैभव गहलोत का साथ देगा औऱ जैसलमेर, शिव, चोहटन आदि में मानवेन्द्र सिंह का।

शेरगढ में बाबूसिंह राठौड अपनी राजनीति बचाने के लिए शेखावत के साथ तो नजर आ रहे है पर बाबूसिंह को टिकट वसुंधरा राजे के दम पर मिलता है। ऐसे में वसुंधरा राजे की अदृश्य लहर इस बार जोधपुर सीट पर पूरी तरह छाई हुई है। इसका असर ना केवल पोकरण औऱ शेरगढ़ के राजपूत पर होगा बल्कि इलाके का जाट भी इससे खासा प्रभावित रहेगा।  ऐसे में गजेन्द्र सिंह का फोकस भले ही ग्रामीण इलाके रहे पर उनकी आस शहरी वोटों औऱ मोदी लहर से ही रहेगी।

जोधपुर शहर में रावणा राजपूत, माली, बनिया, कायमखानी औऱ मुस्लिम वोट अशोक गहलोत के साथ नजर आ रहा है। पाकिस्तानी हिन्दू, जिनके मुद्दों को भाजपा ने राजनीतिक रुप से तो भुनाया पर उनके कल्याण के लिए काम करने में कोताही बरती, इस बार अशोक गहलोत में अपना विश्वास जता रहा है। जोधपुर में राजपूतों औऱ अशोक गहलोत में कडवाहट कॉलेज के जमाने की है। चालीस साल की राजनीती के बाद भी गहलोत, राजपूत समाज में अपनी पकड़ को मजबूत नही कर पाये है। राजेन्द्र गुढा को गहलोत के करीबी माना जाता है पर वे राजनीति के ऐसे तंमचे है जो दोनों तरफ चल सकते है। आर्मचेयर प़ॉलिटिशियन धर्मेन्द्र राठौड़ को करीब रखने के कारण, वैसे भी गहलोत की छवि राजस्थान में राजपूतों के हितेषी की नही है। ऐसे में बीजेएस से ज्यादा वोटों की उम्मीद गहलोत को वैसे भी नही है। विश्नोई और जाट वोट भले ही अशोक गहलोत के साथ नही है पर उनके विरोध में जाने की संभावनाएं भी कम नजर आती है। जाट और विश्नोई बाहुल्य इलाकों में वोटिंग प्रतिशत कम रहने के आसार जताये जा रहे है।

गजेन्द्र सिंह शेखावत ने नागौर में हनुमान बेनीवाल के नांमाकन में शिरकत कर, टायर के भरोसे अपनी गाड़ी चलाने की कोशिश जरुर की। नागौर में बेनीवाल केवल प्यादा है औऱ खेल के सूत्रधार राजेन्द्र राठौड है, जो खुद दिल्ली को अपनी वफादारी औऱ दमखम दिखाने में मशगूल है। ऐसे में शेखावत को बेनीवाल के माध्यम से कोई फायदा होगा, ये सोचना बेमानी है। उल्टा असर ये कि बेनीवाल को फूंटी आंख नही देखना चाहने वाले राजपूत युवा में उनके इस कदम से नाराजगी बढ़ी है। ऐसे में शेखावत को भले ही जोधपुर में मोदी लहर का सहारा हो पर उसकी जमीनी हकीकत एक मृगमरिचिका के समान है।

बाडमेर-जैसलमेर में भी मोदी लहर को लू लग गयी है। हालांकि मानवेन्द्र सिंह ने स्वाभिमान की बात करना छोड दिया है पर वे ना तो पूरे राजपूत वर्ग को अपने साथ कांग्रेसी बना पर रहे है ना ही जाट को कांग्रेसी रख पा रहे है। मानवेन्द्र सिंह को वसुंधरा राजे के करीबियों ने पहले स्वाभिमान की लडाई के लिए उकसाया फिर धर्मेन्द्र राठौड़ के मार्फत उनके मन में कांग्रेस में शिफ्ट होने का बीच बोयां। शेखावाटी से स्वाभिमान रैली में भाग लेने वाले उनके एक करीबी शेखचिल्ली ने उसी शाम को महफिल में कह दिया था कि उनका उद्देश्य मानवेन्द्र को भाजपा से बाहर लाना था, बाकि काम अपने आप हो जाएगा।

राजस्थान में राजपूतों की राजनीतिक साजिशें राजेन्द्र राठौड, धर्मेन्द्र राठौड़, चिकन टिक्के का बिल देने वाले एक बस वाले औऱ उनके बीच खमां खमां करते एक पूर्व पत्रकार, कुछ चेनलों के पत्रकारों औऱ करणी सेना से जुडे कुछ लोगों के कॉकस में सीमित हो गयी है।

कल्याण सिंह कालवी के राजनीतिक सारथी औऱ राजपूतों की राजनीति के चाणक्य प्रेम सिंह सांझू को करणी सेना तक ने हाशिये पर धकेल दिया है। लब्बोलुआब ये कि राजपूत संघर्ष ज्यादा कर रहा है औऱ राजनीति कम। इसका खामियाजा ना केवल मानवेन्द्र सिंह औऱ गजेन्द्र सिंह को उठाना पड रहा है, वही अशोक गहलोत भी अपनी राजनीतिक महारत के बावजूद गाहे बगाहे आम राजपूत के निशाने पर आ ही जाते है।

ऐसे में बाडमेर में मानवेन्द्र सिंह के सामने चुनोती कड़ी है। अगर राजपूत वोट पूरी तरह से भाजपा का दामन नही छोड़ पाया तो ओबीसी भी शिफ्ट नही होगा। ऐसे में केवल मुस्लिम औऱ दलित वोटों की गणित के सामने जाटों का पलड़ा भारी ही रहेगा। फिर भी बाड़मेर में निश्चित रुप से मुकाबला कांटे का होगा और मोदी लहर से ज्यादा स्थानीय गठजोड का असर वोटिंग पर होगा।

पाली में पीपी चौधरी को भीतरघात का खतरा तो है पर मोदी लहर के कारण कार्यकर्ता व समर्थक बंधा हुआ है औऱ वोट प्रतिशत साठ से उपर रहने की स्थिती में उनकी सीट सुरक्षित नजर आ रही है। जालौर में भी राईका-रैबारी वोटों में रतन देवासी पूरी तरह सेंध नही लगा पाये है। ऐसें में जालोर सीट की चाबी फिर से कलबी और विश्नोई वोटों के पास ही रहने की संभावना नजर आ रही है।

जातियों के सतुंलन औऱ स्थानीय गठबंधनों के बीच मोदी लहर मारवाड में लू के थपेडों के बीच मृगमरिचिका सी नजर आ रही है।  

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