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मोदी लहर से राजस्थान के कई राजनीतिक सितारे गर्दिश में

2014 के चुनावों ने भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया। पर 2019 के चुनाव उससे भी महत्वपूर्ण है क्योकि ये चुनाव राजनीति की दिशा को बदल देगें। मोदी लहर की शुरुआत राजस्थान में दिसम्बर 2013 के विधानसभा चुनावों के साथ हुई पर राजस्थान के लिए 2014 से 2019 का सफर एक रोलर-कोस्टर राईड रहा है। 2019 का चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि ये कई सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाएगा। कुछ सूर्यग्रहण भी होगे पर पूर्ण ग्रहण की संभावना नजर नही आ रही।

बात खगोल की गणनाओं की होगी तो शुरुआत वसुंधरा राजे से होना लाजमी है। मोदी-शाह की छाया का सबसे अधिक असर वसुंधरा राजे की राजनीतिक ग्रह-दशा पर है। लोकसभा चुनावों के टिकटों को लेकर हुई रस्साकशी के दौरान राजेन्द्र राठौड़ जैसे कई वैदर-कॉक ने समय रहते पाला बदल लिया और जो बच गये थे वे भी पहला मौका देख कर निकलने के लिए समान बांधे तैयार है।

भाजपा अगर स्वयं के बूते पर बहुमत पाती है तो वसुंधरा राजे के लिए आने वाला समय धौलपुर महल की सजावट में ही गुजरेगा। जहां उनके पुत्र दुष्यंत सिंह वहां सीसीटीवी कैमरे लगाकर बैंगन की फसल की चौकसी बड़ी मुस्तैदी से कर रहे है। मोदी अगर कमजोर रह गये तो भी वसुंधरा राजे के सितारे तब तक सिर नही चढ सकेगें जब तक पुरानी चांड़ाल-चौकड़ी इर्द-गिर्द बनी रहेगी। उनके नक्षत्रों की गणित में बहती हवाओं खासकर ताजा नये हवा के झोकों का रोल अहम रहेगा।

अपनी तीसरी पारी का तीसरा महीना बीतते बीतते, अशोक गहलोत फिर से प्रशासनिक रुप से फैलियर साबित हो गये। करीबी पुलिस अधिकारियों पर अति विश्वास के चलते, गहलोत के हनीमून पीरियड़ में ही बलात्कार की घटनाएं बढ़ गयी। आलम ये कि बदनामी राष्ट्रीय स्तर की हुई और मोदी ने कांग्रेस और गहलोत पर हमला करने का कोई मौका नही चूका। दिल्ली में गोटियां फिट होने के बावजूद ब्यूरोक्रेसी पर अति विश्वास ने अशोक गहलोत के जादू को फेल कर दिया है।

अशोक गहलोत ने सरकार को ऑटो मोड पर रखा हुआ है पर मारवाड़ की पुरानी कहावत है – चेलकियां स्यूं चेल चाल जावै, तो बाबों बूढ़ी क्यूं लावै।

राजनीतिक रुप से, अशोक गहलोत के लिए 2019 का चुनाव अति महत्वपूर्ण है। उनका बेटा वैभव जोधपुर से मैदान में है औऱ उसकी जीत ही गहलोत को राजस्थान कांग्रेस के सबसे बडे क्षत्रप के रुप में पुनर्स्थापित कर सकती है। जोधपुर में गहलोंत ने पूरा जोर लगाया है और सूत्रों की माने तो कई लोगों ने वैभव की जीत पर भी सट्टा लगाया है। हनुमान बेनीवाल को लेकर गहलोत का राजनीतिक पासा गलत पड़ा और लाजमी भी था क्योकि बेनीवाल की राजनीतिक बढ़त हमेशा मारवाड़ में गहलोत का नुकसान करेगी और भाजपा को फायदा। वैभव गहलोत जीते तो श्रेय अशोक गहलोत को ही जायेगा। और हारे, तो इसका एक बड़ा कारण हनुमान बेनीवाल होगें।

जोधपुर के समीकरण में गजेन्द्र सिंह शेखावत के सितारे भी उलझे पड़े है। शेखावत के ख्वाब उंचे है औऱ जीते तो मोदी के करीबी मंत्रियों में से एक होगें और अगर हार गये तो प्रदेश संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनका इंतजार कर रही है। राजपूत सांसदों में इस बार दिया कुमारी सबकी नजरों के केन्द्र में रहेगीं, वही राज्यवर्धन सिंह अपने जलवे को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करेगें। जो चैप्टर बंद होगा वो है – मानवेन्द्र सिंह का। अगर वे हारे तो कांग्रेस में उनकी कोई भूमिका नही रहेगी और भाजपा को उनकी जरुरत नही। गोपाल सिंह ईड़वा जरुर सचिन पायलट के राजनैतिक सलाहकार बने रहेगे पर ओला जी के बंगले में उन्हे मुंगेरीलाल के नाम से पुकारा जाता है।

इधर नागौर में जाटों का सरताज कौन होगा वो तय किया है राजपूत वोटों ने। बेनीवाल को लगा कि मौका अच्छा है, मोदी लहर की सवारी में मिर्धा ब्रांड़ को खत्म कर दिया जाये तो जाटों की राजनीति का एकछत्र राज उसके पास होगा। पर, वहां ज्योति मिर्धा लट्ठ लेकर खड़ी थी। मारवाड़ की छोरी और हरियाणवी दूध-चूरे का असर ऐसा हुआ कि बेनीवाल को छटी का दूध याद आ गया। मुकाबला बेनीवाल के राजपूत दोस्तों और नागौर के राजपूतों के बीच था और परिणाम सामने आने ही वाला है। ज्योति मिर्धा ने तो इन चुनावों में अपनी महारत साबित कर दी पर मिर्धा ब्रांड़ के दूसरे नीबूं निचुड गये।

सचिन पायलट ने 2019 में गुर्जरों की राजनीति पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए मेहनत की और अगर कांग्रेस दौसा की सीट को जीतने में कामयाब होती है तो वे अपने को पूर्वी राजस्थान के सबसे बड़े लीड़र के रुप में स्थापित कर देगे। अजमेर और मध्य राजस्थान में सचिन पायलट का पहले से दबदबा है। दौसा की सीट अगर कांग्रेस जीतती है तो सबसे ज्यादा नुकसान किरोड़ी-किरोड़ी को होगा। किरोड़ी बैसंला को फिर से पटरियों पर जाना होगा वही किरोड़ी मीणा को रोड पर। नुकसान वसुंधरा राजे का भी होगा क्योकि जसकौर मीणा को उनके करीबी माना जाता है। जसकौर के टिकट के लिए वसुंधरा राजे ने आखिर तक पैरवी की थी। जसकौर जीत गयी तो किरोड़ी मीणा की राजनीति का सितारा अस्त हो सकता है।

लब्बोलुआब ये कि अशोक गहलोत के लिए आने वाला समय कैसा रहेगा ये निर्भर करेगा कि वे किस तरह से राहुल गांधी की बदलती स्टाईल के साथ अपने को ढालते है। ताजी हवा और युवा टेलेंट का उनकी राजनीति में समावेश उनकों प्रांसगिक बनाये रखने में मदद कर सकता है। य़ही दवा वसुंधरा राजे के लिए भी काम कर सकती है। अर्जुन मेघवाल, राज्यवर्धनसिंह, सचिन पायलट के लिए आने वाला समय सामान्य रहेगा वही दिया कुमारी और ज्योति मिर्धा के सितारे परवान चढ सकते है। गजेन्द्र सिंह शेखावत, राजेन्द्र राठौड, हनुमान बेनीवाल और मानवेन्द्र सिंह को अपनी कुंड़ली में शनि, मंगल और राहु के उपाय करने की आवश्यकता रहेगी।

 

 

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