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राजस्थान में भाजपा के रंग में रंगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

संघ वालों के तीन ही काम – भोजन, भाषण और विश्राम।

पर अब वो बाते नही रही। संघ काम में जुटा है पर राष्ट्र निर्माण में नही बल्कि भारतीय जनता पार्टी के राज को लाने और बनाये रखने में। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सांस्कृतिक संस्था है जो भारतवर्ष में चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण के काम में जुटी है। संघ के लिए भारत की संस्कृति का अर्थ उन सभी लोगों और समुदायों के जीवन औऱ दैनिक आचार का समागम है जो कि भारत देश के नागरिक है। संघ का अपना एक कायदा है औऱ उनके प्रचारक औऱ कार्यकर्ता अनुशासन के लिए जाने जाते है। भाजपा, विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय सेविका संघ औऱ कई अन्य आनुषांगिक संगठन संघ से जुड़े है पर उन्हे अपने स्तर पर वैचारिक स्वतंत्रता प्राप्त है। राम मंदिर, गौ कल्याण, घर वापसी, मुस्लिम तुष्टीकरण, धारा 370 औऱ अब बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत से निकालने के मुद्दे संघ के ह्रदय के करीब है औऱ इन मुद्दों पर वे अपने स्तर पर सक्रिय रुप से कार्य कर रहा है। ये सभी बाते आधिकारिक रुप से संघ द्वारा कही जाती है, जो मोदी काल में अपनी उच्च जाति उच्च विचार छवि को बदल कर पिछड़ो, दलितों औऱ मुस्लिमों के कल्याण के मुद्दों को भुनाना चाहता है।  

सवाल ये कि क्या संघ वास्तव में अपने आनुषांगिक संगठनों द्वारा किये गये प्रबल आंदोलनों से अपने आप को अछूता रख सकता है। क्या संघ वास्तव में एक सांस्कृतिक संस्था है जो कि राष्ट्र निर्माण में जुटी है। या फिर संघ, चितपवन ब्राह्णों द्वारा बनायी गयी वो व्यवस्था है जो येन केण प्रकारेण मनुवादी विचारधारा को जिन्दा रख कर, भारतीय समाज पर कब्जा जमाये रखना चाहती है। किसी भी व्यक्ति या संस्था के चरित्र का पूरा पता तब ही चल पाता है जब उनके पास पॉवर होता है। सांस्कृतिक विचारधारा को आगे बढाने के लिए राजनैतिक बल का होना अति आवश्यक है। हेगड़ेवार औऱ गोलवलकर के जमाने में संघ को जानबूझ कर राजनीति से दूर रखा गया पर देवरस का जमाना आते आते विचार बदल गये औऱ संघ ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका को प्ररोक्ष रुप से बढ़ाना शुरु किया। पहले जनसंघ औऱ फिर भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से संघ आज भारत की राजनीति पर नियंत्रण कर रहा है। नरेन्द्र मोदी काल संघ के लिए उन आदर्श स्थितियों में से है जहां संघ का एक स्वयं सेवक प्रधानमंत्री है औऱ संघ की नीतियों पर चलने की कटिबंधिता पर आज भी कायम है।

मोदी तो भारत के मध्यम वर्ग की आस थे औऱ उन्होनें अपनी छवि को उसी तरह से पोषित किया जो कि आम आदमी के दिल में बस सके। राजनीतिज्ञ के तौर पर नरेन्द्र मोदी आज उस मुकाम पर है जहां उनकी राष्ट्र निर्माण के लिए प्रतिबद्धिता पर कोई भी सवाल नही लगाया जा सकता। पर क्या संघ ने मोदी को बनाया या फिर समाज के पिछड़े वर्ग से आने वाले मोदी को संघ एक सीढी की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। इस सवाल का जवाब तो खुद मोदी अपनी किसी किताब में भविष्य मे देगें पर ये बात निश्चित है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में संघ का दखल अपने चरम पर है।

बिहार में आरक्षण संबधी अपने विचारों को जाहिर करने के बाद संघ ने भाजपा के लिए स्थिती अटपटी कर दी थी। मोदी के प्रधानमंत्री होने के बावजूद दिल्ली, उडीसा और बंगाल में सरकार ना बना पाने का विश्लेषण ये था कि संघ भाजपा के साथ मिलकर चलेगा तभी कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में यही हुआ और गौरखपुर मठ के योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया। आसाम में भाजपा ने सरकार तो बनायी पर क्या संघ के कामों को फायदा भाजपा को मिला या फिर मोदी ने सही राजनीतिक शतरंज खेली, ये अभी भी बहस का विषय है। उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी भाजपा, कांग्रेस को मिटाने के चक्कर में खुद ही “फूल-कांग्रेस” में बदल गयी। गोवा में संघ का भारी दखल था फिर भी सरकार बनाने के लिए मनोहर पारीकर को ही वापस लाना पड़ा। इसके बाद संघ के संगठन और कार्यकर्ताओं ने खुल कर कर्नाटक में कार्य किया जहां सफलता नही मिल पायी। इस सब कवायद का असर ये हुआ कि संघ को भी अब राजनीति की शराब भाने लगी है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश औऱ छत्तीसगढ के विधानसभा चुनावों में इसका असर साफ दिखाई पड़ रहा है। मध्य प्रदेश औऱ छत्तीसगढ़ में तो हालात काबू करने लायक है पर राजस्थान की स्थिती विचित्र है। यहां धोलपुर की जाट-रानी वसुंधरा राजे, चंबल के बीहड़ो के बागियों की तरह संघ या मोदी-मय भाजपा के काबू में आने को तैयार नही। मोदी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को राजस्थान की विशेष जिम्मेदारी दी है और संघ उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। “वसुंधरा ही भाजपा है औऱ भाजपा ही वसुंधरा है” की तर्ज पर चलने वालें सिपहसालर आजकल नजरे छिपा कर अपनी अपनी जमीन बचाने में लगे है वही भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं की आंखों में आशा की चमक साफ दिख रही है।

जिलों में जाये तो भाजपा कार्यालय से ज्यादा अब संघ के शक्ति केन्द्रों पर नेताओं का जमावड़ा ज्यादा नजर आ रहा है। संघ के प्रांत स्तर के अधिकारी लगातार समन्वय बैठके ले रहे है औऱ टिकिट किसको मिलेगा या नही मिलेगा उसकी भी जानकारी जुटा रहे है। संघ के प्रचारकों औऱ संगठन कार्यकर्ताओं तक तो मामला समझ में आता है पर ज्यादातर जगह संघ के प्रकल्प स्थानीय धन्नासेठों के मदद से चलते है। ऐसे में राजस्थान में कई जगहों पर संघ पर भी उस तरह के आरोप सामने आ सकते है जैसे कि राजनैतिक दलों पर लगते रहते है। वैसे में संघ में कार्यकर्ताओं औऱ पदाधिकारियों की आय और संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने का रिवाज नही है। ऐसे में संघ के नाम पर कई जगहों पर रंगारंग कार्यक्रम की बहार है।

राजनीतिक रुप से राजस्थान में संघ का दखल हमेशा से लिमिटेड़ ही रहा है। भैरोंसिंह शेखावत ने संघ औऱ भाजपा की राजनीति को बैलेस करने के लिए कई बार लड़ाई लड़ी वही वसुंधरा राजे के कालखंड़ में लाख इच्छा के बावजूद संघ की कभी उनके गिरेबान पर हाथ ड़ालने की हिम्मत नही हुई। पर मोदी काल में संघ भाजपा मय हो गया है। हालांकि संघ प्रमुख ने यह स्पष्ट रुप से कहा है कि मोदी-मोदी चिल्लाना संघ के कार्यकर्ताओँ का काम नही। पर आज जमीनी हकीकत ये है कि भाजपा ही संघ है औऱ संघ ही भाजपा है।

हालांकि राजस्थान में मोदी और संघ का मुकाबला कांग्रेस से ना हो कर चंबल की दस्यु रानी का किरदार निभा रही वसुंधरा राजे से है। राजस्थान कांग्रेस में वैसे भी जमीनी पकड़ का अभाव है और अपने अर्जुन अशोक गहलोत को दिल्ली में व्यस्त रख कर कांग्रेस ने सचिन पॉयलट को अभिमन्यु बनाने के पूरी तैयारी कर रखी है। ऐसे में राजस्थान की महाभारत कुरुक्षेत्र में ना लड़ी जा कर राजनीतिक पार्टियों के अंदरखाने ही सीमित है।

संघ की सक्रियता राजस्थान में अपने पूरे शबाब पर है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, संगठन मंत्री चंद्रशेखर अपने तरकश के सभी तीरों का इस्तेमाल कर रहे है। राजस्थान में लंबे समय तक काम कर चुके प्रचारक मुरलीधर राव फिर से नजर आने लगे है औऱ सुनील बंसल लखनउ में बैठ कर भी राजस्थान पर नजर रखे हुए है। ऐसें में संघ आज भाजपामय हो चुका है पर कांग्रेस इस पर सवाल नही कर रही। कांग्रेस के लल्ला सचिन पॉयलट तो ललकार नही पायेगें पर हो सकता है अशोक गहलोत संघ को सामने आकर चुनाव लड़ने की चुनौती दे ड़ाले। राजस्थान में चुनाव संघ लड़े या फिर भाजपा, पर एक बात तय है संघ का संगठन आज पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है औऱ इस नशे का आदत से आज तक कोई उबर नही पाया।

 

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