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राजस्थान में राजपूत स्वाभिमान की लडाई नागौर पहुंची

ना कोई लीड़र है और ना ही कोई बैनर, पर राजपूतो के स्वाभिमान की असली लड़ाई अब राजस्थान की सत्ता के केन्द्र – नागौर में लड़ी जाय़ेगी। इतिहास गवाह है कि मारवाड का राज भले ही जोधपुर से चलता हो पर जब भी युद्ध का ढोल गांवों में बजाया जाता था तो सबसे बड़ी तादात में भोमियों को भेजने का काम  नागौर के रेगिस्तानी मैदान ने ही किया।

स्वाभिमान के लिए संघर्ष की कहानी 2014 के चुनाव में जसवंत सिंह का टिकट कटने के बाद शुरु हुई थी। आम राजपूत ने तो अपने तन मन धन से स्वाभिमान की बेल को सींचने का काम किया पर सेनापतियों को अपनी अपनी जागीर की फिक्र ज्यादा थी। जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र ने कांग्रेस में शामिल तो हो गये पर उनका हाल भी फोग के उस पेड़ जैसा था जो बीकानेर के महाराजा राय सिंह को मालवा में दिखाई दिया था।

 

तूं सै देसी रुखड़ो, म्है परदेसी लोग…।

म्हाने अकबर तैडिया, तू कत आयो फोग..।।

फिर भी आम राजपूतों ने उनका साथ नही छोडा और 2019 के चुनाव में उनके स्वाभिमान की लड़ाई से पीछे हट जाने के बावजूद, ताल ठोक कर खडे है। नागौर में हनुमान बेनीवाल के भाजपा का दामन थामने के बाद मारवाड़ में राजपूतों के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। अब ना केवल राजपूती आन-बान-शान खतरे में है बल्कि मारवाड़ के समाज का पूरा ताना बाना तहस नहस होने की परिस्थिती पैदा हो गई है।

अैकण दिन रै कारणै, राखीजै रजपूत..।

उण दिन ही भूंड़ा हुवै, कायर, स्याल, सपूत…।।

इस कहावत पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ के लोग तो सहमत नजर आते थे पर समय के साथ लूणी में काफी पानी बह गया या फिर ये कहे कि पानी पड़ा पडा सूख गया। समय के साथ भाजपा में राजपूतों के लिए स्थान कम होता गया। रही सही कसर राजेन्द्र राठौड जैसे लोगो ने पूरी कर दी, जिन्होने हडुमान जैसे राजनीतिक दानव को ना केवल पैदा किया, बल्कि अब वसुंधरा राजे के खिलाफ इस्तेमाल करने की पूरी तैयारी भी कर ली है। राजस्थान में भाजपा, भैरोंसिंह शेखावत की भाजपा तो रही नही पर बदतर हालत ये है कि अंदरखाने की मारकाट में राजपूत और मूल ओबीसी के लोग जिन्होने पार्टी को खून पसीने से सींचा था, उन्हे पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है। इसकी शुरुआत वसुंधरा राजे ने की थी पर उन्ही के चेले अब गुड़ से शक्कर हो कर, उस काम को आगे बढ़ा रहे है।

तगा तगाई मत करै, बोलै मुंह संभाल…।

नाहर नै रजपूत नै, रैकारै री गाल…।।

राजनीतिक पार्टी के रुप में भाजपा का उद्देश्य केवल सत्ता पाने तक सीमित हो गया लगता है। हनुमान बेनीवाल के लिए नागौर की सीट छोड़ कर, राजस्थान ने भाजपाईयों ने ये साबित कर दिया कि उन्हे जीतने के लिए मोदी के करिश्मे पर पूरा भरोसा नही है। बेनीवाल की एन्ट्री से भाजपा के मूल वोट बैंक राजपूत और ओबीसी पर सीधा असर पड़ेगा।

बेनीवाल के भाजपा की छतरी में आने के बाद मारवाड में राजपूत, दलित और मूल ओबीसी अब नया ठौर तलाश करने के में जुट गया है।

हनुमान बेनीवाल के भाजपा के साथ आने का असर मारवाड़ की सभी सीटों पर होगा। पिछले चुनावों में भी परबतसर, मकराना, लाडनूं इलाको के राजपूतों ने ज्योति मिर्धा को वोट दिया था। कारण ये था कि उन्हे सांपनाथ या नागनाथ में से एक को चुनना है। 2014 में मुकाबला त्रिकोणीय़ था पर इस बार भाजपा ने इसे राजपूतों के लिए आर पार की लड़ाई बना दिया है। सत्तर के दशक में नाथूराम मिर्धा ने भी ड़ीडवाना में उम्मेद सिंह को विधायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ऐसे में नागौर में ना केवल राजपूतों के पास कर्ज उतारने का मौका है बल्कि उनको ये भी साबित करना है कि वे भाजपा के गुलाम नही बल्कि एक स्वाभिमानी, समझदार कौम है। वैसे भी राजपूत और मूल ओबीसी में ज्योति मिर्धा को लेकर कोई विरोध की भावना नही है।

 

नागौर से जब हवा चलती है तो राजनीतिक मौसम पूरे मारवाड़ का बदलता है। ऐसे में बेनीवाल के भाजपा में जाने का असर जोधपुर औऱ बाड़मेर सीट पर भी होगा। अशोक गहलोत से व्यक्तिगत रिश्तो के बावजूद जोधपुर में राजपूत अभी तक भाजपा के साथ खड़ा नजर आ रहा था। पर, अब जब भाजपा ने अपने तुरुप के पत्ते को जनता को दिखा दिया है, तब जोधपुर में राजपूत और रावणा राजपूत, बड़ी समझदारी से राज के साथ रहने का मन बना चुका है और अशोक गहलोत उनके लिए बांहे फैलाये खड़े है।

हनुमान बेनीवाल के भाजपा में जाने का सबसे बड़ा फायदा मानवेन्द्र सिंह को होगा। राजपूत – मुस्लिम – दलित वोटों की गणित कागज पर तो अब तक सुहानी नजर आ रही थी पर हकीकत में उसका साकार होना मुश्किल था। बदले हुए हालात में, बाड़मेर में ना केवल राजपूत पूरी तरह से मानवेन्द्र सिंह के साथ खड़ा हो गया है बल्कि मूल ओबीसी और सामान्य वर्ग भी भाजपा से छिटका हुआ नजर आ रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की स्थिती राजस्थान में एक मुट्ठी बाजरे के चक्कर में तख्तोताज खोने जैसी हो गयी है।

सदियों पहले दिल्ली के शासक शेरशाह ने बड़ी समझदारी से कदम पीछे हटा लिए थे। पर, लडाई अब भाजपा के सत्ता के अभिमान और मारवाड़ के स्वाभिमान के बीच की लड़ाई में बदल गयी है। मारवाड़, खासकर नागौर में, 2109 का चुनाव अब राजपूतों के लिए किसी धर्म युद्ध से कम नही।

धरती बेड़ी धूड़ री, रही पगां महाराण…।

अड़ग रह्या ध्रम ऊपरै, हो गौरव हिन्दवाण..।।

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