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राजेन्द्र राठौड – राजनीति के जोकर के बदलते रंग

राजनीति की ताश में जोकर का रंग जरुर बदल सकता है पर उसकी औकात भी बदल जाए, ये जरुरी नही। ताश के खेल – पोकर, में जोकर का इस्तेमाल तिकड़ी बनाने के लिए तो किया जाता है पर जोकर कभी तुरुप नही होता। राजस्थान की राजनीति में राजेन्द्र राठौड का वही स्थान है। जब खेलने वाले वसुंधरा राजे जैसे बड़े खिलाड़ी थे तो राठौड की चल निकली, पर जोकर अब तुरुप का इक्का बनने की चाहत रखता है औऱ गेम जारी है।

अठारह अप्रैल को राजेन्द्र राठौड औऱ हनुमान बेनीवाल दोनो एक ही मंच पर होगे। मौका होगा, जब हनुमान बेनीवाल नागौर से टायर की चुनाव चुन्ह पर नामांकन भरेगे। बेनीवाल को भाजपा का एमएलए बनाना हो या फिर समय समय पर बोतल में पानी भरने से लेकर टायर की रिट्रेडिंग करनी हो, राजेन्द्र राठौड़ ने अपनी दोस्ती को बखूबी निभाया है। वसुंधरा राजे के ना चाहते हुए भी अमित शाह ने बेनीवाल के लिए नागौर सीट छोड़ी औऱ सूत्रधार थे – राजेन्द्र राठौड। गोलमा भाभी के इस देवर ने दौसा में भी खूंटा गाडने के लिए पूरी कसरत की पर पार नही पड पायी। राजसंमद में दीया कुमारी को टिकट मिलना लगभग निश्चित ही था पर वहां भी फंसे पेचों को सुलझाने का श्रेय़ राजेन्द्र राठौड को दिया जा रहा है।

सारे राजनीतिक गुणा-भाग का लब्बोलुआब ये कि वसुंधरा राजे को किसी तरह से राजस्थान से बाहर करने के लिए धक्कामुक्की शुरु होने से पहले इस बात का जवाब तैयार किया जा रहा है कि अगर वसुंधरा नही तो फिर कौन ?

मौका भी है और दस्तूर भी, पर क्या अरमानों की उड़ान को पंख लग पायेगें ?

बेनीवाल और राठौड की जुगलबंदी से नागौर के जाट और राजपूत दोनो उहापौह की स्थिती में है। बेनीवाल का समर्थक युवा किसी भी राजपूत नेता से सख्त नफरत करता है और उनकी राजनीति की नींव भी इसी भावना पर आधारित है। ऐसे में राठौड़ का बेनीवाल के साथ मंच पर होना, बेनीवाल समर्थक युवा में कन्फ्यूजन को और बढा देगा। पहले से ही, नागौर में जाट वर्ग का युवा असमंजस में है कि ज्योति मिर्धा की विकास और समृद्धि की बात को चुना जाये या फिर बेनीवाल के साथ निरन्तर संघर्ष की राह पर चला जाये। रोचक ये कि राजपूत की मनस्थिती भी ज्यादा अलग नही है। गजेन्द्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह और दिया कुमारी की तिकडी के बीच बेनीवाल को ला कर राजेन्द्र राठौड किंगमेकर की भूमिका में आने का प्रयास कर रहे है।

क्या नागौर का राजपूत, राजेन्द्र राठौड के कहने पर अपने सीने पर पत्थर ऱख कर बेनीवाल को वोट दे देगा ?

ऐसा होने की संभावना कम है पर फिर भी राजेन्द्र राठौड ने अपना दांव खेल दिया है। ऐसे में नागौर में वसुंधरा समर्थक जाट और बेनीवाल विरोधी राजपूत अपने आप को एक ही पाले में खड़ा पा रहे है। आन्नदपाल प्रकरण में राठौड की भूमिका की चर्चा अभी भी ड़ीडवाना और लांडनू के चौराहो पर आम है। दूसरी तरफ दारिया एनकांउटर मामले में भी राजेन्द्र राठौड को अभी तक जाटों ने माफ नही किया है। ऐसे में किंग बनने से पहले किंगमेकर बनने की जल्दी में राठौड ने अपने पत्ते जरुरत से जल्दी खोल दिये लगते है।

राठौड़ की कलाबाजियों के किस्सों की कमी नही। शुरुआती किस्सा वो जहां सीबी शर्मा ने विधायकपुरी थाने के लॉकअप में फोटों खिचवायां था। नेतागिरी की शुरुआत में भैंरोसिंह शेखावत के इर्द गिर्द मजमा लगाने से लेकर वसुंधरा राजे के राईट हैंड बनने तक, राजेन्द्र राठौड का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नही। विडम्बना ये है कि ज्यादातर हिट फिल्मी कहानियां ड्रामे से भरी ट्रेजिक स्टोरी होती है।

ऐसा पहली बार नही कि राजेन्द्र राठौड ने राजपूतों के साथ जाटों की राजनीति में दखल दी हो। चुरु जिले से छह बार जीतना किसी भी करिश्मे से कम नही। पिछले विधानसभा चुनावों से पहले राठौड ने लीला मदेरणा को भाजपा में लाने की कोशिश की थी जो अशोक गहलोत ने नाकाम कर दी। इस बार फिर से उन्होने अपने पुराने साथी हनुमान बेनीवाल पर दांव खेला है। बेनीवाल ज्योति मिर्धा को राजनीतिक रुप से खत्म करना चाहते है और राठौड की मन की इच्छा वसुंधरा राजे को मात देने की है।

ऐसे में नागौर के रेगिस्तानी मैदान फिर से घमासान के लिए तैयार है और ये बात तय है कि शिकार किसी बडे योद्धा का ही होगा। बड़ा सवाल ये कि जोकर का रंग बदला है पर क्या औकात बदल पायेगी। जानकार बताते है कि दुनाली जब वसुंधरा राजे के हाथ में होती है तो शिकार बच नही पाता। इस बार तो वसुंधरा राजे की दुनाली के सामने उनके दो पंसदीदा निशाने है – राठौड और बेनीवाल। मैदान पर वही पुराना है – राजस्थान की राजनीति की धुरी – ऩागौर।

तरीका को अंहिसावादी ही सही रहेगा, नही तो पूछने वाले वसुंधरा राजे से विधानसभा में फिर से पूछ सकते है – कुत्तें को गोली क्यो मारी ?

 

 

 

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