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लोकसभा चुनाव 2019: राजस्थान में कांग्रेस बनी परिवारवाद की झांकी

बाप, बेटा, लुगाई, जमाई, बेटी, पोती, बहू – राजनीति में परिवारवाद की परिकाष्ठा का नजारा अगर किसी को देखना हो तो लोकसभा चुनावों में राजस्थान के कांग्रेसी टिकिटों की बंदरबांट से अच्छा उदाहरण मिलना मुश्किल है। ऐसा पहली बार नही हुआ कि राजनीति में मुकाम पाने के बाद पुत्र मोह के चलते कई जहाज ड़ूब गये। पर, जादूगर अशोक गहलोत को पुत्र मोह का रोग धृतराष्ट्र बना देगा, इसकी राजनीतिक पंडितो को उम्मीद नही थी।    

राजस्थान में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए अशोक गहलोत, इसे आखिरी पारी के रुप में खेल रहे है। यही कारण है कि उनकी राजनीति के हाशिये पर काफी समय से मंडराते रहे बेटे वैभव गहलोत को वे अब सेंटर स्टेज पर लाने की जुगत लगा रहे है। गहलोत ने पिछले दो सप्ताह में जालोर-सिरोही, जोधपुर और टोंक-सवाईमाधोपुर सीटों में दोरे किये है। पुत्र मोह का बुखार उन पर इतना हावी है कि संयम लोढ़ा, जिनको वे फूटी आंख देखना भी पंसद नही करते, गहलोत ने उनसे लंबी मंत्रणा की।

राजेश पायलेट के पुत्र के रुप में राजनीति में प्रवेश करने वाले सचिन पायलेट ने अपना रुख साफ तरीके से रख दिया है कि वे परिवारवाद को बढावा देने के पक्ष में नही है। पायलेट के करीबियो को उम्मीद है कि वैभव गहलोत को मैदान में ला कर पटखनी देने का मजा अलग ही होगा। पांच बार सांसद और पांचवी बार विधायक बने तीसरी बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अभी तक केवल दो चुनाव हारे है। एक उनका पहला चुनाव था और दूसरा 1989 का लोकसभा चुनाव, जब वे राम लहर की चपेट में आ गये।

कहने वाले ये भी कह सकते है कि ज्यादातर बड़े नेता पहला चुनाव हार कर ही शुरुआत करते है। पर, वैभव गहलोत का राजनीतिक करियर उनके खुद से ज्यादा, उनके पिता के राजनीतिक बागवानी के स्किल की परीक्षा बनता जा रही है। वैसे भी राजनीति में अभी तक कोई ऐसी तकनीक ईजाद नही हो पायी है जिससे बंजर सिर पर बालो की फसल उगाई जा सके। बीज का पौधा या पौधे का पेड़ बनेगा या नही, ये भविष्य के गर्भ में है पर एक बात निश्चित है कि अशोक गहलोत सिचांई करने में कोई कसर बाकी नही छोड़ रहे।

कुछ करनी, कुछ करम-गत, कुछ भावी की खोट…!

गैंहूँ नै उमग्यौ फरै, लिख्या करम में मोठ….!!

बेटा तो स्वर्गीय रामनिवास मिर्धा का भी लाईन में है, पर हरेन्द्र मिर्धा का नंबर आना मुश्किल नजर आता है। किसी अच्छे पंडित से राजयोग की रेखा ढूंढवाने की उनको खासी जरुरत है। उधर, जसंवत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह समझदारी से चाल चल रहे है। जसंवत सिंह परिवार में अब कालू बाई – शीतल कवंर का बोलबाला नही रहा। पोथी वाले पंड़ितो की राय ले कर, मानवेन्द्र सिंह अपनी पत्नी चित्रा सिंह को चित्तौड़गढ से चुनाव लडाने के लिए चक्कर लगा रहे है। चित्रा सिंह का परिवार भैंसरोडगढ का रहने वाला है। घर में खटपट नही हो, इसलिए बाडमेर का पल्लू भी अभी पकड़ा हुआ है जिससे छोटे भाई को राजनीति के छींके का सपना, लगातार दिखाया जा सके। वैसे भी मानवेन्द्र सिंह के लिए भूपेन्द्र सिंह और भिनियाद वाले उनके चेले में ज्यादा अंतर नही है, दोनो की जगह उनकी जूतियों में है। उनके पिता जसंवत सिंह, चित्तौडगढ से सांसद रहे है और चित्रा सिंह कांग्रेस के टिकट पर सीपी जोशी को कड़ी टक्कर दे सकती है।

बात, पत्नियों को राजनीति में आगे बढाने की चले तो प्रमोद जैन भाया को कैसे भूला जा सकता है। उनकी पत्नी उर्मिला जैन ने बांरा-झालावाड सीट से वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यन्त सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। वे इस बार भी मैदान में आने को लालायित है। अंतर केवल इतना है कि इस बार उनसे मुकाबले के लिए वसुंधरा राजे ने पहले से ही तैयारी शुरु कर दी। अब जीत बेटे की होगी या बहू की, ये वहां की जनता को तय करना है पर बोलबाला परिवारवाद का ही रहेगा। जयपुर ग्रामीण सीट से महाराजा विश्वेन्द्र सिंह की पत्नी दिव्या सिंह का नाम कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में काफी समय से उड़ाया जा रहा है। अपने चाहने वालो में ज्योति के नाम से प्रसिद्ध, महाराजा विश्वेन्द्र सिंह खांटी राजनेता माने जाते है। ऐसे में उनके राजनीतिक पत्तों की चाल की हवा का रुख आखिरी समय तक किसी को भी लगना असंभव लगता है।

कांग्रेस की राजनीति में जमाईयों के नाम का बोलबाला रहा है। पूर्व विधायक और मंत्री बीना काक के जमाई रिजु झुंझुनूवाला ने अजमेर लोकसभा क्षेत्र से ताल ठोकने का मन बना लिया है। क्षेत्रीय दिग्गज सचिन पायलेट और रघु शर्मा के उनके साथ खड़े होने से वे मजबूत स्थिती में नजर आ रहे है। रघु शर्मा और बीना काक करीबी माने जाते है। रिजु झुंझुनूवाला को राजनीति में भले ही बीना काक के जमाई के रुप में लोग जानते हो पर भीलवाड़ा और अजमेर इलाके के लिए वे बेटे की तरह है। परिवार के टेक्सटाईल व्यवसाय की इलाके में पुरानी जडे है। भाजपा के पास यहां दांव खेलने के लिए एक ही नाम है वो है रासासिंह रावत के बेटे तिलक सिंह रावत। पर, वसुंधरा राजे, अजमेर को जाट सीट बनाये रखने पर तुली है, ऐसे में अजमेर की सीट पर मुकाबला कडा होने की संभावना है।

कांग्रेस में जमाईयो की एक और केटेगरी है, वो है एड़ोप्टेड जमाई। वो भी ऐसे-वैसे नही, गांधी परिवार के एडोप्टेड जमाई। अलवर में भंवर जितेन्द्र सिंह के ससुराल वालों के, गांधी परिवार से पारिवारिक रिश्ते है। ऐसे में भंवर जितेन्द्र को गांधी परिवार में जमाई ही माना जाता है। उनके जोश का आलम ये है कि टिकट की घोषणा होने से पहले ही उन्होने अलवर में चुनाव कार्यालय का उद्घाटन कर दिया है। पर, भवंर साहेब, अलवर में यादवों के भंवर में फंसे हुए नजर आ रहे है।

पुराने राजनीतिक परिवारों में, शीशराम ओला की बहू राजबाला ओला झुंझुनू से भाग्य आजमा सकती है। जोधपुर मे पूर्व सांसद और गहलोत के करीबी बदरी राम जाखड़ अपनी बेटी मुन्नी देवी गोदारा के लिए जोर आजमाईश कर रहे है। बीकानेर से खाजूवाला प्रधान सरिता चौहान दावेदार है। वे पूर्व विधायक गोविन्द मेघवाल की बेटी है। मंत्री भवंरलाल मेघवाल के बेटी बनारसी देवी भी बीकानेर औऱ श्रीगंगानगर सीट से दावेदार है। बहन चन्द्रेश कुमारी की जोधपुर में दाल गलना मुश्किल नजर आ रहा है।

बात बेटियों को हो तो पोतियां क्यो पीछे रहे। नागौर के दिग्गज नेता नाथूराम मिर्धा का पोती ज्योति मिर्धा फिर से चुनाव मैदान में है। जनता तो पूरी तरह से ज्योति मिर्धा के साथ है और भाजपा भी डरी हुई नजर आती है। पर, खतरा भीतरघात से है। नागौर में अभी भी नाथूपंथियों का एक छत्र राज है। ऐसे में चाचा रिछपाल मिर्धा और हरेन्द्र मिर्धा की कुछ पार पड़ेगी, ऐसा मुश्किल लगता है।

बेटे-बेटियों का राजनीति में आगे बढाना तो स्वाभाविक सा लगता है। पर, कांग्रेस इस बार परिवारवाद की उल्टी गंगा बहाने की भी कोशिश कर रही है। भीम से विधायक सुदर्शन सिंह रावत के पिता लक्ष्मण सिंह रावत को राजसमंद से टिकिट देने पर विचार चल रहा है। हाल ही मे जयपुर वापस आये एक बड़े पुलिस अधिकारी के साथ मिल कर खान का व्यवसाय करने वाले सुदर्शन सिंह को सचिन पायलेट का करीबी माना जाता है। वैसे तो राजसमंद सीट को गहलोत और सीपी जोशी के वर्चस्व वाली सीट माना जाता है। पर, बडे नेताओ के कोई नया चेहरा नही ढूंढ पाने की नाकामी के बीच सचिन पायलेट की चवन्नी चल गई। सीपी जोशी की नाक के नीचे उनके धुर विरोधी और राजनीति से लगभग रिटायर हो चुके पूर्व विधायक लक्ष्मण सिंह को कांग्रेस टिकट दे रही है। हार जीत तो किस्मत का खेल है पर परिवारवाद के नाम पर बाप को आगे लाने का ये भारतीय राजनीति का शायद पहला उदाहरण होगा।

जय परिवारवाद।।

 

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