You are here
Home > Rajasthan > Politics > सतीश पूनियां की ताजपोशी ऱाजस्थान में वसुंधरा युग के अंत की शुरुआत है।

सतीश पूनियां की ताजपोशी ऱाजस्थान में वसुंधरा युग के अंत की शुरुआत है।

तीन महीनों के इंतजार के बाद राजस्थान में भाजपा के नये अध्यक्ष की घोषणा हो गई। सतीश पूनियां को राजस्थान में भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया है। चार चुनाव हारने के बाद आखिरकार 2018 में आमेर जैसी कठिन सीट से चुनाव जीत कर विधायक बने सतीश पूनियां के लिए संघर्ष कोई नयी बात नही। पर, कार्यकर्ताओं के अपने माने जाने वाले सतीश पूनियां को खतरा दुश्मनों से ज्यादा दोस्तो से होगा।

भाजपा का आम कार्यकर्ता सतीश पूनियां के अध्यक्ष बनने से खासा खुश है, वही पुराने दरबार के सिपहसालार धीर-गंभीर बने हुए है। पूनियां की ताजपोशी को राजस्थान में वसुंधरा युग की समाप्ति का आगाज माना जा रहा है। वही दूसरी ओर, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व का ईशारा साफ है कि अब किनारे किये गये उन कार्यकर्ताओँ को आगे बढाया जाएगा, जो विचार औऱ नीति-रीति के पक्के रहे है।

वसुंधरा राजे ने जिन लोगों को पिछले बीस सालों में भाजपा की राजनीति में आगे बढाया वे या तो दुनिया छोड़ चुके है या फिर किनारे लग चुके है। वसुंधरा राजे ने जाटों की बहू होने के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी। उनके गुट के जाट नेता सांवरलाल जाट, धर्मपाल चौधरी औऱ दिगम्बर सिंह दुनिया में नही रहे, वही रामनारायण ड़ूड़ी राजनीतिक अस्ताचल की ओऱ है।

राजेन्द्र राठौड़ जैसे खास सिपहसालार अब नया खूंटा ढूंढ रहे है, वही रोहिताश कुमार ये तय नही कर पा रहे है कि वसुंधरा राजे की सेवा में रहे या फिर पुराने मित्र राठौड़ की राजनीतिक आंकाक्षाओं के पैग बनाये। बीकानेर की यात्रा के दौरान देवी सिंह भाटी से गलबहियां भी दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने की कवायद थी। पर देवी सिंह भाटी जब भैरोंसिंह शेखावत के नही हो सके तो वे अपने राजनीतिक जीवन की आखिरी सांसों से वसुंधरा राजे का नाम कितना जप पायेगें, ये तय नही।

जाटों की बात करे तो सतीश पूनियां की गिनती खांटी जाट नेताओं में नही होती। राजस्थान में जाट राजनीति को आज हनुमान बेनीवाल के चेहरे से पहचाना जाता है। वही राजस्थान के जाट को अब वसुंधरा राजे के साथ अपना भविष्य नजर नही आता। ऐसे में सतीश पूनियां की सोफ्ट इमेज जाटों के पढे लिखे औऱ समझदार तबके को भाजपा से जोड़े रखने में कामयाब सिद्ध होगी। वही जाट युवा, बेनीवाल में अपना राजनीतिक भविष्य खोजने की नाकाम कोशिश जारी रखेगा।

राजस्थान में जहां भी नजर दौडाई जाये वहां यही दिखेगा कि वसुंधरा राजे नें अपने गुर्गों की फौज को आगे बढाया और भाजपा का मूल कार्यकर्ता उपेक्षित रहा। सूत्रों का मानना है कि ऐसे सभी लोगों की सूची बन कर शीर्ष नेतृत्व को पहुंचाई जा चुकी है। ऐसे में सतीश पूनियां के सामने सबसे बडा चैलेंज दलालों को बाहर का रास्ता दिखाकर राजस्थान भाजपा का भाजपाई-करण करना होगा। ओम माथुर औऱ भूपेन्द्र यादव के राजनीतिक हस्तक्षेप और सुनील बंसल के बढ़ते प्रभाव को मैनेज करना भी एक चुनौती से कम नही।

पूनियां को दिसम्बर 2020 तक राजस्थान भाजपा को विचार-परिवार की भावना के अनुरुप एक मजबूत संगठन के रुप में खड़ा करना होगा। खासकर युवा मोर्चा, जहां जातिगत समीकरणों को साधने के लिए राजूपत अध्यक्ष लाया जाना लाजमी है।

सतीश पूनियां के राजस्थान में भाजपा का अध्यक्ष बनने का सबसे बड़ा राजनीतिक मतलब वसुंधरा राजे के युग के अंत की शुरुआत है। आने वाले समय में वसुंधरा राजे अपने पैतंरों से रिझने-रिझाने, मनाने औऱ कई जगह आंसू बहाकर अपने लिए समर्थन जुटाने के कोशिश करती नजर आयेंगी। पर, धौलपुर की रानी की स्थिति अब वैसी ही है जैसी 1947 भोपाल के नवाब के भारतीय संघ में विलय स्वीकार करने के बाद धौलपुर स्टेट की थी।

Leave a Reply

Top