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हनुमान बेनीवाल – डूबती भाजपा के लिए फायदे का सौदा

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को जमूरे औऱ जोकर पालने का शौक है। भोकनें वाले कुत्तों को वो गोली मार दिया करती है। हनुमान बेनीवाल उनके हाथों का जमूरा है या नही यह सीधे सीधे कहना मुश्किल है पर  भाजपा और संघ से  बेनीवाल की करीबी कई बार  उन पर शक पैदा करती है। वैसे भी राजनीति असीमित संभावनाओँ से भरा आकाश है, जहां पॉवर में रहना, बने रहना औऱ लगातार बने रहना ही एकमात्र उद्देश्य है।

‘प्यार में दिल को मार दे गोली, ले ले मेरी जान’ अमिताभ बच्चन की एक फ्लाप फिल्म महान का ये गाना आपको याद भी नही होगा पर जब हनुमान बेनीवाल ने पहली बार मोबाइल खरीदा तो यह उनकी कॉलर ट्यून था। अपनी राजनीति में भी बेनीवाल गोली मारने औऱ मरने की बात तो करते है पर जान देने या लेने से कोसों दूर रहते है। उनके पिता बरणगांव के रामदेव बेनीवाल तीन बार नागौर की मूंड़वा विधानसभा से विधायक रहे। हनुमान बेनीवाल ने राजनीतिक घुट्टी तो अपने घर में ही ली पर वो उगटी तब जब लंबे पतले इस युवक ने 1994 और 95 में दो बार लगातार जयपुर के राजस्थान कॉलेज से अध्यक्ष का चुनाव जीता। 1996 में बेनीवाल राजस्थान विधि कॉलेज के अध्यक्ष रहे और 1997 में वे निर्दलीय के रुप में चुनाव लड़ कर राजस्थान विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने।

1998 का साल हनुमान बेनीवाल औऱ उनके परिवार के लिए काफी कष्टदायक रहा। भैरोंसिंह शेखावत से करीबी संबधों के चलते रामदेव बेनीवाल को मूंड़वा से भाजपा का टिकिट मिला पर उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। गांव में एक जमीन के विवाद को ले कर हुई परमाराम नाम के व्यक्ति की हत्या का आरोप भी बेनीवाल परिवार पर लगा। हनुमान बेनीवाल के बड़े भाई प्रहलाद ने जेल में ही दम तोड़ दिया वही हनुमान बेनीवाल खुद 88 दिन तक जेल में रहे।

अगला चुनाव 2003 में आया तब तक राजस्थान में भाजपा का चाल और चेहरा पूरी तरह से बदल चुका था। वसुंधरा राजे की परिवर्तन यात्रा को भारी जनसमर्थन मिल रहा था औऱ एक राजपूत नेता की पूरी कवायद के बावजूद हनुमान बेनीवाल को मूंडवा से भाजपा का टिकिट नही मिल पाया। उषा पूनियां, जो कि पूर्व विधायक गौरी पूनियां की पुत्रवधु औऱ विजय पूनियां की पत्नी थी, उन्हे मूंडवा से भाजपा का टिकिट मिला। हनुमान बेनीवाल ने इंडियन नेशनल लोकदल के टिकिट पर चुनाव लडा और 3300 वोटों से हार गये।

2006 में सीकर में हुए गोपाल फोगावट हत्याकांड़ औऱ ड़ीडवाना में हुए जीवन गोदारा हत्याकांड़ के बाद हुए विरोध प्रदर्शन में बेनीवाल को राजनीतिक जमीन मजबूत करने में काफी मदद की। गोदारा, डीड़वाना में बजरंग दल का कार्यकर्ता था, वही फोगावट सीकर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों के करीबी माने जाते थे। नागौर और शेखावाटी में शराब तस्करों औऱ छोटे अपराधियों की आपसी लड़ाई को जाटों औऱ राजपूतों के बीच की गैंगवार का नाम देकर कई राजनेताओं ने अपनी रोटियां सेंकी औऱ हनुमान बेनीवाल को भी इस मामले में मुखर होने का पूरा फायदा मिला।

परिसीमन के बाद मूंड़वा सीट का ज्यादातर हिस्सा खींवसर में आ गया औऱ 2008 में बेनीवाल ने भाजपा के टिकिट पर 17000 वोटों से जीत हासिल की। वसुंधरा राजे को उनके सिपहसालरों ने किसी तरह बेनीवाल को टिकिट देने के लिए मना लिया, वही आरएसएस के कुछ प्रचारकों से परिचय तुरुप का पत्ता साबित हुआ। भाजपा के विधायक के रुप में बेनीवाल ने मोर्चा तो खोला पर वो अशोक गहलोत के खिलाफ ना हो कर वसुंधरा राजे के खिलाफ था। उनका विरोध ऐसा ही था जैसा आज घनश्याम तिवाड़ी कर रहे है। वे वसुंधरा राजे के खिलाफ तो है पर संघ और भाजपा के नेताओं से संबध बनाये हुए है। बेनीवाल सही समय पर सही जगह थे।

पूर्वी राजस्थान के खांटी नेता किरोड़ीलाल मीणा ने वसुंधरा राजे के खिलाफ ताल ठोक रखी थी औऱ बेनीवाल भी उनके साथ हो लिए। किसने किसको काम में लिया, ये आज भी बहस का विषय है। 2008 से 2013 तक बेनीवाल विधायक तो भाजपा के थे पर वसुंधरा राजे का विरोध कांग्रेस से भी ज्यादा करते थे। उनके सखा किरोड़ीलाल की राजनीति को बेनीवाल का साथ एक औऱ एक ग्यारह लग रहा था वही तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी  वसुंधरा राजे के खिलाफ ये किरोड़ी और बेनीवाल की जुगलबंदी सुहा रही थी।

किरोड़ी लाल को मंत्री पद के लालच औऱ सूरवाल कांड़ की जांच ठंड़े बस्ते में रख कर गहलोत ने अपने साथ बनाये रखा। मीणा, पारंपरिक कांग्रेसी वोट बैंक है और किरोड़ी लाल के भाजपा से अलग होने से राजनीतिक समर्थन को लेकर मीणा समुदाय में कोई धर्मसंकट नही था। या तो वोट कांग्रेस को जाता या फिर किरोड़ी लाल को, भाजपा को नही। इसका सीधा फायदा 2013 में अशोक गहलोत को मिलना था, पर मोदी लहर ने सब गुड़ गोबर कर दिया।

पर बेनीवाल की स्थिती इससे ठीक उलट है। अगर मारवाड़ और राजस्थान में किसान राजनीति के इतिहास को देखें तो चालीस के दशक में बलदेव राम मिर्धा की किसान महासभा के विलय से पहले कांग्रेस राजस्थान में हाशिये पर थी। 1947 के बाद, सांमतशाही विरोधी नीतियों ने किसान को कांग्रेस के साथ जोड़ दिया और कांग्रेस का राजस्थान पर एक छत्र राज रहा। भेरोंसिंह शेखावत ने अपने कालखंड़ में रामदेव सिंह बरणगांव, राम रघुनाथ चौधरी आदि जाट नेताओं को अपने साथ जोड़ने का प्रयास तो किया पर वो पूरी तरह सफल नही हो पाये।

कारण ये कि राजस्थान का जाट राज चाहता है, राज में भागीदारी नही।

2013 के चुनावो तक विजनरी और प्रोग्रेसिव कहलाना पंसद करने वाली वसुंधरा राजे ने अपने आप को जाट नेता के रुप में प्रोजेक्ट किया। बेनीवाल, अब युवाओं के हीरो हो चुके थे। 2013 का चुनाव उन्होने निर्दलीय के रुप में लड़ा और मोदी लहर के बावजूद 20000 से ज्यादा वोटों से जीता।

कहने वाले ये भी कहते है कि राजस्थान के जाटों के दिमाग में तो वसुंधरा बसती है पर दिल में बेनीवाल रहता है।

किरोड़ी लाल ने मौका देख कर पाला बदल लिया। वो अपनी छोटी बहन वसुंधरा राजे के खेमें के खास सिपहसालार हो गये पर बेनीवाल को समां ले ऐसी छतरी अभी बनी ही नही। बेनीवाल राजस्थान की विधानसभा में सबसे मुखर आवाज है। हुंकार रैलियों के माध्यम से वे बाडमेर से सीकर तक अपना शक्ति प्रदर्शन कर चुके है और 2018 के चुनाव से पहले जयपुर में बड़ी रैली कर नयी पार्टी की घोषणा भी कर सकते है। बड़ा सवाल ये है कि क्या बेनीवाल अपने दम पर राजस्थान में तीसरा मोर्चा खड़ा कर पायेंगे।

2013 के चुनावों में बेनीवाल के कारण भाजपा को लोहावट में सीधा फायदा ये हुआ कि विश्नोई वोट आखिरकार गजेन्द्र खींवरस के पक्ष में पड़ा वही बलदेवराम मिर्धा के पोते हरेन्द्र मिर्धा नागौर में अपनी अलमारी नही बचा पाये। 2014 का चुनाव नागौर की जाट राजनीति के लिए और भी खास रहा। बेनीवाल ने निर्दलीय के तौर पर ज्योति मिर्धा के खिलाफ चुनाव लड़ा जिसका सीधा फायदा वसुंधरा राजे के करीबी छोटू राम को हुआ। ऐसें में बेनीवाल ने नागौर में दोनो मिर्धा परिवार की विरासत की जड़े खोदने का काम बखूबी किया। अगर बेनीवाल मैदान में नही होते तो बाबा की पोती ज्योति मिर्धा, बाबा का इतिहास दोहरा देती, जब वे नाथू राम मिर्धा की तरह राजस्थान से कांग्रेस की अकेली सांसद बन जाती।

बेनीवाल भले ही नाथूराम मिर्धा को अपना आदर्श मानते हो पर उनका मकसद नागौर की राजनीति में नाथूराम मिर्धा से बड़ी लकीर खींचना है।  सभी जानते है कि नागौर राजस्थान की राजनीति की धुरी है औऱ इतिहास गवाह है कि जो नागौर पर राज करेगा वही राजस्थान पर राज करेगा।  

हनुमान बेनीवाल की राजनीति को अगर करीब से देखें तो उनका राजनीतिक ड़ीएनए भाजपाई है। उनके पिता रामदेव सिंह बेनीवाल ने देवराज उर्स के समय में कांग्रेस बहुत पहले छोड़ दी थी औऱ बेनीवाल पर कांग्रेस की छाया अभी तक नही पड़ी। बेनीवाल के मजबूत होने से फायदा भी भाजपा को है।ये सब जानते है कि राजस्थान में जाट वोट वही जायेगा जहां से राज की महक आ रही है। ऐसे में यदि वसुंधरा राजे अपने सारे प्रयासों के बावजूद जाटों को अपनी छतरी में नही रख पाती तो भी इसका पूरा फायदा कांग्रेस को नही मिलेगा। जाट युवाओं में बेनीवाल का क्रेज किसी से छिपा नही औऱ जो वोट भाजपा से छिटक कर कांग्रेस की झोली में जाना था, वो बेनीवाल के कारण वहां नही जायेगा। ऐसे में नुकसान के बावजूद भी भाजपा सर्वनाश की ओर नही बढ़ रही।

हनुमान बेनीवाल का तीसरा मोर्चा कई जगह त्रिकोणीय संघर्ष पैदा करेगा जहां कांग्रेस आसानी से जीत सकती है। सचिन पायलट को ये गणित समझ में आये या ना आये पर अशोक गहलोत इस खतरे को काफी पहले भांप चुके है। जहां किरोड़ी लाल के भाजपा में जाने से कांग्रेस को सीधा फायदा होगा वही बेनीवाल का तीसरा मोर्चा भाजपा को फायदा देगा। घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनी भाजपा का कुछ शहरी इलाकों में नुकसान करेगी वही बेनीवाल के मोर्चे का फायदा सीधा सीधा भाजपा को होगा।

सूत्र बताते है कि बेनीवाल के करीबी अभी तक उनके अलावा किसी और प्रत्याशी को नही ढूंढ पाये है जो कही से भी उनके लिए चुनाव जीत सके। उनको ऐसा कोई केंड़ीडेट चाहिए भी नही जो चुनाव जीत सके। ऐसे में हनुमान बेनीवाल सारे तमाशे के बाद भी ‘एकला चालों रे’ की अपनी पुरानी नीति में सफल होते नजर आ रहे है।

खास बात ये कि अगली विधानसभा में बेनीवाल के मोर्च का असर तो दिखेगा पर चेहरा सिर्फ एक होगा – हनुमान बेनीवाल।  

 

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