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हर तिमाही में कट रही है राजपूताना में राजपूती मूंछ

जयपुर के सिटी पैलेस से लेकर बाडमेर तक, राजस्थान में राजपूत अपनी मूंछों को लेकर चिंतित है। मूंछे जो राजपूती आन, बान और शान का प्रतीक मानी जाती है। आम राजपूत हमेशा से एक किसान रहा है औऱ सैनिक केवल तब बनता था, जब गांव में ढोल बज जाता था। पर, ढोल बजने पर तो देश की रक्षा के लिए राजपुरोहित, जाट, गुर्जर, बलाई, मुसलमान भी कंधे से कंधा मिला कर युद्ध में जाया करते थे। ऐसे में पहले के राजा और आज के नेता किस राजपूत अभिमान की बात करते है, ये समझ से परे है। पर ये भी सच है कि नाम, नमक और निशान की दुहाई दे कर आदम जात में जोश तो सदियों से भरा ही जा रहा है।   

जयपुर के सिटी पैलेस में पिछले दिनों एक बैठक का आयोजन हुआ। राजस्थान भर के राजा-महाराजे इस बैठक में बुलाए गये थे, मुद्दा ये कि किस तरह से राज पर पकड़ बनी रह सके। हर राजा की अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग था, औऱ केकडे आप इकट्ठे कर भी ले तो भी उन्हे एक जगह रखना भी एक भारी जिम्मेदारी है। देर रात तक चले कॉकटेल मंथन के बाद सभी अपने अपने खंड़हरों में वापस चले गये। पिछले पांच सालों में यह पहली बार नही है कि हमेशा से राजनीति की मंझदार में रहा जयपुर का सिटी पैलेस अपने आप को मांझी बनाने की कोशिश कर रहा है।

राजमहल होटल को खुर्द बुर्द करने का प्रयास और उसके बाद हुआ आंदोलन गवाह है कि राजपूती मूंछ के नाम पर कई अलग अलग दिशा में बहती धाराएं भी कुछ देर के लिए एक तरफ बह सकती है। वैसे भी सवाई मान सिंह राजप्रमुख की हैसियत से राजमहल में रहते थे जो रेजीडेन्सी कहलाता था। ऐसे में आज तक ये कोई नही बता पाया कि जब राजप्रमुख का पद राज्यपाल में बदल गया औऱ राज्यपाल राजभवन में चले गये तो राजमहल जयपुर राजपरिवार का कैसे हो गया। पर राजा महाराजा को एक दूसरे की दुखती रग को जानते है और जब खूबसूरत इमारत पर हैरिटेज माफिया का दिल आ ही जाये तो दूसरे के लिए उसे बचाना मुश्किल हो सकता है।फिर भी, आम राजपूत सड़को पर उतरा औऱ एक बारगी राजमहल प्रकरण में राजपूती मूंछ कटने से बच गयी।

  मानवेन्द्र सिंह की राजपूती मूंछ राजनैतिक है। पचपदरा की रैली में हर वक्ता ने अभिमान औऱ स्वाभिमान को अपने अपने तरीके से बयां करने की कोशिश की। लब्बोलुआब ये था कि वंसुधरा राजे का उनके मन में भारी विरोध है और भाजपा में वो अपना राजनीतिक भविष्य नही देखते। मानवेन्द्र सिंह ये जनता को ये नही बताया कि क्या अगर कोई राजनैतिक पार्टी उनके पिता को टिकिट देने से मना करती है तो ये उनके स्वाभिमान की लड़ाई कैसे हो जाती है।

जमीन पर कमजोर जसवंत सिंह को चित्तोड़गढ की सीट से तीन बार औऱ फिर दार्जिलिंग से चुनाव लड़वाना को क्या वो भाजपा का उनके पिता पर अहसान नही मानते ?

वैसे भी राजस्थान की राजनीति की धरी अभी भी नागौर में ही बसती है, पर शोर बाड़मेर में होता आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले शोर इतना कर्कश नही होता था औऱ बड़े नामों की इज्जत बनी रहती थी। पर, राजपूत नेताओं को हनुमान बेनीवाल बनने का कीड़ा लग गया है जो घुण की तरह उनको गर्द बना रहा है। स्वाभिमान रैली के मंच से बार बार वक्ताओं ने अजमेर उपचुनाव को याद किया पर सच्चाई ये है कि अगर केकड़ी को छोड़ दिया जाये को अजमेर जिले में राजपूत सिर्फ मुट्ठी भर है। भाजपा के परपंरागत वोट बैंक जाट, रावत औऱ गुर्जरों से भरे इस इलाके में उपचुनाव की हार का सबसे बड़ा कारण भाजपा के कार्यकर्ता का विमुख होना था।

पिछले पांच साल में सबसे दर्दनाक घटना जो जातिय संघर्ष में बदल सकती थी वो हुई जोधपुर के सामराउ में। शराब तस्करों की आपसी लड़ाई में कई परिवारों के घरों को जला दिया गया और दर्जनों राजपूत परिवारों को कठिनाई में दिन गुजारने पड़े। महीने भर तक जोधपुर के ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट बंद रहा और कई बालिकाओं की शादियों के लिए समाज को मिलकर प्रयास करने पड़े। पर सामराउ की बात कोई नही करता। सब बात करते है आन्नदपाल की औऱ चतुरसिंह की। रावणा राजपूत गैंगस्टर आन्नदपाल सिंह की एन्काउंटर पर सवाल अभी भी कायम है। एनकांउटर औऱ उसके बाद हुई रैली में जिस तरह से पुलिस तंत्र ने राजनैतिक व्यक्तियों के हथियार की तरह काम किया वो जगजाहिर है। चतुर सिंह एनकाउंटर भी निश्चित रुप से बहुत से पेच थे। दोनों मामलों की जांच अब सीबीआई कर रही है, जिसे राज का तोता कहा जाता है।

मामला राजमहल का हो या फिर आन्नदपाल और चतुरसिंह का, ये किसी भी तरह से राजनीतिक मामले नही। पर, ये बात निश्चित है कि राजपूत और उनसे जुड़ी जातियों का वसुंधरा राजे पर से विश्वास इतना ड़िग चुका है कि उनका मैल को भी सांप समझ लेना स्वाभाविक है। रही बात मानवेन्द्र सिंह के स्वाभिमान की, तो 2018 का राजनीतिक रण उनके भविष्य की दिशा तय कर ही देगा, जो हार या जीत, दोनों ही स्थितियों में निश्चित रुप से दिल्ली की ओर जाती है।

जो अपने भविष्य को लेकर निश्चिंत नही होते वे इतिहास की शरण लेते है। ऐसा ही राजस्थान में राजपूतों के साथ हो रहा है। राजमहल प्रकरण के बाद फिल्म पदमावत को लेकर हुए विवाद में नतीजा शून्य निकला। वैसे भी इतिहास के नाम पर फिल्मों का विरोध कुछ लोगों के लिए अब धंधा बन गया है। वैसे भी राजनीति के नाम पर राजपूतों ने कुछ खास नही किया। समाज का नेतृत्व कर रहे लोकेन्द्र कालवी राजपूती मूंछ के सबसे बड़े ठेकेदार कहे जाते थे। पर जब चेला ही कंपीटीशन हो जाए तो यह मान लेना चाहिए कि धंधा फलफूल रहा है। एक जमाने में चेले रहे सुखदेव सिंह गोगामेड़ी में अपनी अपनी दुकान अलग खोल ली, ये बात अलग है कि वो हिस्ट्रीशीटर रह चुके है और बलात्कार जैसे संगीन इल्जाम भी झेल रहे है।

ऐसे में सवाल ये है कि बाबू सिंह राठौड़ या फिर नवोदित भंवर सिंह भाटी जैसे लोगों की राजपूत राजनीति में जगह कहां है जो लगातार चुने जा रहे है औऱ अपने क्षेत्र का विकास भी कर रहे है। राजेन्द्र राठौड़, राजपाल सिंह, प्रतापसिंह खाचरियावास औऱ राव राजेन्द्र सिंह वैसे भी राजपूतों की राजनीति नही करते। ऐसे में आम राजपूतों के सामने सबसे बड़ा सवाल ये कि बार बार मूंछ कटने का खतरा मंडराना और उसके बाद हो रहे हो-हल्ले से उनकी जिंदगी में पर क्या असर पड़ रहा है। औऱ उत्तर सब जानते है – कम होते रोजगार के अवसर औऱ सिमटती जमीन से आम राजपूत आज किसान से भूमिहीन मजदूर हो चुका है। इस तरह की सामाजिक स्थितियां क्रांति के लिए तो सही माहौल तैयार कर रही है पर बिना लक्ष्य की क्रांति का परिणाम हार के सिवा कुछ नही होता।

मानवेन्द्र सिंह की दिशाहीन राजनीति राजपूतों की मूंछे एक बार फिर से कटवा सकती है।       

 

 

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