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2018 का चुनाव राजस्थान की जाट राजनीति को नयी दिशा देगा !!

राजस्थान में जाट राजनीति सबसे बड़ा फेक्टर है। वसुंधरा राजे ने पांच साल तक अपना तख्त जाटों के भरोसे ही बचाये रखा नही तो 2015 में उनकी ऱवानगी होना लगभग तय हो चुका थी। मोदी भी राजस्थान के जाटों से खौफ खाता है और यही कारण है कि वसुंधरा राजे ने दंबगता से अपनी सरकार चलायी और विधानसभा चुनावों के टिकट बांटे। पर, वसुंधरा के राज में जाटों के राजनीति उनके सिपहसालारों, दरबारियों और चाटूकारों तक सीमित हो गयी। इसका उन्हे राजनीतिक फायदा भी हुआ और कई लोग आज की तारीख में विधायक या सांसद है।

खैर, पर 2018 की सबसे खास बात ये रही कि राजस्थान में जाटों की राजनीति की दिशा और दशा अब साफ हो चुकी है। जाट राजनीति की बात शुरु होगी तो नागौर से, क्योकिं नागौर ही राजस्थान में राजनीति की धुरी है। मारवाड़ किसान सभा ने जब कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया उसी के बाद कांग्रेस राजस्थान में राजनीति का अकेला खंभा बन पायी। पिछले सत्तर सालो में बलदेव राम मिर्धा, कुंभाराम आर्य, नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा, रामनिवास मिर्धा, दौलतराम सहारण, रामरघुनाथ चौधरी, रामदेव सिंह बरण, गौरी पूनियां, सुमित्रा सिंह, कमला, शीशराम ओला, नारायण सिंह, रामनारायण चौधऱी, गंगाराम चौधरी जैसे बड़े नामों का बोलबाळां रहा। जाट राजनीति के इतने सालों के मंथन से “जहर की बोतल” निकली जो बड़े नामों की राजनीति को खत्म कर, आपसी समझ औऱ सूझबूझ की राजनीति को छोड़ कर राजस्थान को जाट बनाम पैंतीस कौम में बदल देना चाहती है।

2018 का चुनाव इस मायने में इसलिए महत्वपूर्ण है कि सात दिसम्बर को राजस्थान का जाट अपने भविष्य की दिशा कर देगा।

नागौर में मुकेश भाकर और रामनिवास गवाड़िया जैसे नये नाम उभर कर सामने आये है। वही रिटायर्ड़ आईपीएस सवाई सिंह और विजयपाल मिर्धा भी पहली बार चुनाव लड़ रहे है। लांडनू से सात बार विधायक रहे हरजीराम बुरड़क के बेटे जगन्नाथ इस बार बेनीवाल की बोतल से घुट्टी पी रहे है। चेतन ड़ूड़ी और महेन्द्र चौधरी पहले से जाने पहचाने नाम है पर सबकी नजरे हनुमान बेनीवाल पर टिकी है। भाजपा ने वैसे भी दस में से केवल चार टिकट जाटों को दिये है।

बलदेव राम मिर्धा की चौथी पीढी के राजनीतिक वारिस रघुवेन्द्र मिर्धा को अब नये सिरे से अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश करनी होगी। उनके पिता हरेन्द्र मिर्धा के सन्यास नही लेने के राजनीतिक हठ ने रघुवेन्द्र के करियर के बबल्स तो हाल फिलहाल हवा कर दिये है। नागौर के चुनावों में धमाका किया ज्योति मिर्धा ने, जो ना तो उम्मीदवार है, ना ही 2014 में हनुमान बेनीवाल के वोट-कटुआ रोल से हारने के बाद राजनीति में सक्रिय थी। मरणासन्न नाथूपंथियों में अचानक से जान आ गयी और मतदान से पहले नागौर की सभी सीटों पर पुरानी खांटी जाट नेताओं ने फिर से कमान संभाल ली है।

इसका असर दलित और मुसलमान वोटों पर भी सीधा होगा और यही कारण है कि हनुमान बेनीवाल की जान सांसत में है।

जय़पुर ग्रामीण में कांग्रेस और भाजपा ने दो-दो जाट चेहरे उतारे है। वही शाहपुरा से आलोक बेनीवाल और फुलेरा से चर्चित चेहरा स्पर्धा चौधरी ने ताल ठोक रखी है। नवीन पिलानिया इस बार बसपा से अपनी किस्मत आजमा रहे है। जयपुर ग्रामीण की जाट राजनीति में हरि सिंह का जलवा बरकरार रहा और वे अपने बेटे विद्याधर को फुलेरा से टिकट दिलाने में कामयाब रहे। लालचंद कटारिया इस बार खुद मैदान में है वही गुजरात की पूर्व राज्यपाल कमला, 92 साल की उम्र में अपने बागी बेटे के लिए दर दर जा कर वोट मांग रही है। इस बार के कांग्रेस प्रत्याशी मनीष यादव ने पिछले बार कांग्रेस के काफी वोट काटे थे और यही कारण है कि उनको मैदान में उतारे जाने की सूरत में आलोक बेनीवाल शाहपुरा सीट पर सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे है। कुछ कलम-कसाई इसे अशोक गहलोत की कारीगरी भी मान रहे है।

सीकर में दोनों प्रमुख दलों ने दो-दो जाटों को मौका दिया है। खासबात ये कि सुभाष महरिया और नन्दकिशोर महरिया ने सचिन पॉयलट की जाजम पूरे जोश से बिछायी पर विधानसभा चुनाव में टिकट की बात बन नही पायी। इस सारी तिकड़म का असर ये हुआ कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री महादेव सिंह खंड़ेला आज निर्दलीय के रुप में मैदान में है औऱ जीतने की स्थिती में है। पुराने चावल नारायण सिंह, आखिरकार अपने बेटे विरेन्द्र को टिकट दिलाने में कामयाब हो गये वही गोविन्द ड़ोटासरा, लक्ष्मणगढ़ में अपनी राजनीति बचाने के लिए प्रयासरत है। सीकर की रैली में कांग्रेस का दामन थामने वाले विजय पूनियां और नारायण बेडा भी राजनीतिक गलियों के आखिरी हिचकोले खा रहे है। ऐसे में सीकर में सचिन पॉयलट ने भाजपा से कांग्रेस में आये सुभाष महरिया के कंधे पर बंदूक रख खंड़ेला और पुराने कांग्रेसियों के शिकार के लिए जाल तो बिछाया था, पर राजेन्द्र पारीक, नारायण सिंह औऱ परसराम मोरदिया की तिकड़ी ज्यादा मजबूत साबित हुई।

झुंझनूं में भाजपा ने जाटों को चार औऱ कांग्रेस ने तीन टिकट दिये है। सूरजगढ़ में श्रवण कुमार इस बार बसपा के कर्मवीर यादव कारण फंसे हुए नजर आ रहे है वही झुंझुनूं में निर्दलीय यशवर्धन सिंह ने विजेन्द्र ओला की नींद उड़ा रखी है। मंड़ावा में रीता कुमारी को रामनारायण चौधरी की विरासत बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उनकी वैरतरणी को केवल कायमखानी वोट ही पार लगा पायेगें। सुमित्रा सिंह फिर से कांग्रेस में लौट आयीं है औऱ अपनी राजनीति का सही ईलाज ढूंढनें में नाकाम डॉ चन्द्रभान फिर से प्रेक्टिस की सोच रहे है पर फिर उन्हे पुरानी कहावत याद आ जाती है – नीम हकीम खतरा ए जान। चुरु में कृष्णा पूनियां फिर से राम सिंह कस्वां जैसे भारी ड़िस्कस को मैदान से बाहर फैंकनें के लिए संघर्ष कर रही है वही नरेन्द्र बुड़ानियां सुरक्षित नजर आ रहे है।

बीकानेर की सात सीटों में से तीन पर कांग्रेस ने जाट प्रत्याशी उतारा है वही भाजपा ने केवल एक जाट को टिकट दिया है। ड़ूंगरगढ़ से सीपीएम के गिरधारी लाल सबसे आगे नजर आ रहे है वही वीरेन्द्र बेनीवाल के लिए जीत आसान होगी। बीकानेर में सबकी नजर नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूड़ी पर होगी जो कन्हैया लाल झंवर को बीकानेर पूर्व से टिकट दिला अपना रास्ता साफ करने की जुगत में अपने ही जाल में खुद फंस गये।        

भादरा में जयदीप डूडी का टिकट काट कर कांग्रेस फंसी हुई लग रही है। किसानों के इस गढ़ में जहां राहुल गांधी कई रोड़ शो कर चुके है वहां वामपंथी पार्टी का उम्मीदवार बलवान पूनियां दोनो पार्टियों को कड़ी टक्कर दे रहा है। सार्दुलशहर में कांग्रेस ने संतोष सहारण का टिकट काट कर जगदीश जांगिड दांव लगाया है। संतोष के पिता पूर्व विधायक मोती राम चौधरी नहरी क्षेत्र में एक मजबूत आवाज हुआ करते थे। नोहर से कांग्रेस ने सुचित्रा आर्य का टिकट काट कर अमित चाचन को दिया। सुचित्रा, किसान नेता कुंभाराम आर्य के परिवार से जिन्हे राहुल गांधी ने झुंझुनूं जिले की एक रैली में कुंभकरण तक कह दिया। राहुल गांधी की जबान फिसलने से जाटों में काफी नाराजगी है।

अजमेर में किशनगढ़ औऱ नसीराबाद के कुछ इलाके को ही जाटों का गढ़ माना जाता है। पर, वसुंधरा राजे ने 2003 के बाद अजमेर को एक तरह से जाटों का जिला घोषित कर दिया। परिणाम ये कि सांवरलाल जाट जैसे वफादार के सहारे उनकी नीतियां कामयाब होती रही। कांग्रेस में अजमेर का हर टिकट सचिन पॉयलट ने तय किया औऱ अशोक गहलोत के करीबी नाथूराम सिनोदिया का उन्होने पुरजोर विरोध किया। विवाद हुआ तो नंदराम थाकन को पुष्कर से बुलाकर टिकट थमा दिया गया। सिनोदिया को सहानुभूति के वोटों का भरोसा है वही भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों के प्रत्याशी जमानत बचाने का प्रयास कर रहे है। किशनगढ़ में निर्दलीय सुरेश टांक की टक्कर सिनोदिया से मानी जा रही है। अजमेर का जाट, किशनगढ़ के टिकट के फैसले को ले कर सचिन पॉयलट से खासा नाराज है। ड़ेयरी अध्यक्ष रामचन्द्र चौधरी ने सचिन पॉयलट के आगे समर्पण को किया पर पॉयलट ने केवल अपने मोहरों पर ही भरोसा किया।

राकेश पुरोहित का मसूदा से टिकट इस बात का गवाह है कि कांग्रेस पार्टी हारे या जीते, अजमेर में टिकट उसी को मिला जो सचिन पॉयलट का पिट्ठू था।

दिव्या मदेरणा, विश्वेन्द्र सिंह भरतपुर, दिलीप चौधरी, हरीश चौधरी, हेमाराम, शबनम गोदारा कुछ ऐसे प्रत्याशी है जो राजस्थान की अगली विधानसभा में दिखाई देगें। पर कई जाट नेता, कांग्रेस पार्टी में हुई उनकी फजीती से नाराज भी है। जब राज आने को होता है तो नाराजगी हर छोटी चीज पर होने लगती है और बडे नेता उसकी कद्र भी नही करते, खासकर जब बात सचिन पॉयलट की हो।

जाट राजनीति औऱ कांग्रेस, राजस्थान में एक दूसरे के पूरक है। यहां भाजपा के जाट नेताओँ की बात करना बेमानी है क्योंकि भाजपा में जाटों की राजनीति वसुंधरा राजे से शुरु हो कर वही खत्म हो जाती है। ऐसे में राजस्थान का जाट, राहुल गांधी से अपनी वफादारी की कीमत चाहता है। राजस्थान के जाट की इच्छा एक खालिस जाट मुख्यमंत्री बनवाने की है पर जाटों की आपसी लड़ाई इस सपने को पूरा नही होने देती।

एक देवी ही जाटों का सपना पूरा करने में मदद कर सकती है, पर उससे पहले, अशोक गहलोत ही कांग्रेस के तारणहार जैसे दिख रहे है जिन्होने अपने आप को जाटों का असली दोस्त साबित किया है। दिव्या मदेरणा का टिकट इस बात का उदाहरण है। जाट इस बात को खुले रुप से माने या ना माने, मन के किसी कोने में स्वीकार जरुर करते है कि गहलोत के खिलाफ उनकी नाराजगी का कोई पुख्ता आधार कभी नही था।     

 

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