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राजस्थान में संगठन मंत्री के आम होते चर्चे !!

कृशः कायः खण्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो, व्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः। क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरजकपालर्पितगलः, शुनीमन्वेति श्वा इतमपि च हन्त्येव मदनः।। किसी जमाने में संगठन मंत्री होने का मतलब होता था कि भाईसाहब का आदर सर्वोपरि है औऱ भाईसाहब विचार-परिवार के प्रतिनिधी होने के साथ साथ रीति-नीति के वाहक भी है। पर, सूत्रो की माने

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