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समाजवाद की लहरों पर हिचकोले खाती अशोक गहलोत की तीसरी पारी !!

किसानो का पूरा कर्जा माफ कर दिया गया। बेरोजगारो को हर महीने 3000 रुपये भत्ता दिया मिलेगा। वृद्ध और विधवा पेन्शन य़ोजना में बढोतरी होगी। रोजगार गांरटी स्कीम महानरेगा और मुफ्त दवा योजना को फिर से पुनर्जागृत किया जायेगा। सरकारी कर्मचारियों की पेन्शन ड़ायरी से 20000 तक की दवाईयां मिल पायेगी। गरीबी रेखा से उपर के लोगो को भी गेहुं एक रुपये किलो के भाव पर मिलेगा और सबसे बड़ी बात – यूनिवर्सल बेसिक इन्कम के राहुल गांधी के सपने को साकार करने के पहले कदम भी राजस्थान मे ही उठाये जायेगें।

योजनाओं के विस्तार और उनसे होने वाले लाभ पर नजर ड़ाले तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग जमीन पर उतरने ही वाला है, जहां सबकी जेब में रुपया होगा, हाथ में काम होगा और घर की रसोई में अनाज होगा। कांग्रेस ब्रांड समाजवाद की लहर उफान पर है और सूत्रधार फिर से एक बार अशोक गहलोत है। सूचना के अधिकार से लेकर राईट टू सर्विस गांरटी तक, कांग्रेस की सभी सामाजिक योजनाओं की प्रयोगशाला राजस्थान ही रहा है। सरकारी योजनाओं की सफलता विचार से ज्यादा सूत्रधार पर निर्भर करती है और ये भूमिका गहलोत ने बखूबी निभाई भी है।

जुमलो से परेशान जनता वैसे भी आजकल इतना जल्दी भरोसा नही कर रही है। फिर भी कांग्रेसी समाजवाद की योजनाएं कागज पर तो गरीब के भले के लिए दिखाई देती है। पर सवाल ये है कि क्या इन सब योजनाओं का लाभ कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में मिल पायेगा या नही। वसुंधरा राजे और भाजपा को भी सरकारी योजनाओं के लाभान्वितों में वोटबैंक नजर आ रहा था, पर अंत में काम जातीवाद, पैसा और संघ ही काम आय़ा।

इसका जवाब किसी के पास नही कि अशोक गहलोत सरकार के पहले दो महीने में ही जनता ऊबती हुई क्यों नजर आ रही है।

अलसाते आईएएस अधिकारी, सुस्ताते बाबू औऱ उंघते चपरासी, किसी भी सरकारी ऑफिस में आपको अहसास करा देगें कि राजस्थान में अब कांग्रेस सरकार है। दो महीने पहले तक जो सरकारी अधिकारी, कार्पोरेट कंपनियों की तर्ज पर काम कर रहे थे, वे अब फिर से कलम घिसाई में लग गये है। अपनी कार के दरवाजे से लटक कर सचिवालय में गांधी जी मूर्ती के सामने मिड़िया को जानकारी देते गहलोत की तस्वीरे, गांधी जी को भी सोचने को मजबूर कर रही थी कि जमाना बदल गया है और कुछ कुछ वो भी जिन्हे राजस्थान का गांधी कहा जाता है।

वसुंधरा राजे के खास – डीबी गुप्ता अभी तक मुख्यसचिव बने हुए है। गहलोत ने अपने दो पुराने विश्वस्त आईएएस को रिटारमेन्ट से वापस तो बुला लिया पर सवाल ये है कि जिन लोगो ने नौकरी में रहते हुए कोई तीर नही मारा, वे पेन्शन की उम्र में क्या गुल खिला पायेगें। वैसे भी दिल्ली के ठुकराये एक सज्जन अपने टूटे दिल का मरहम राजस्थान में ढूंढ रहे थे, वही दूसरे फिक्शन की ख्याली दुनियां के पुलाव के मंजे हुए हलवाई माने जाते है।

कालीन के मामूली चोरी की जांच में कपिल गर्ग को पांच साल का वनवास मिला। उनकी लॉयल्टी को ईनाम मिलना लाजमी था पर क्या वे ये बता पायेगे कि सुप्रीम कोर्ट में ये क्यो साबित नही कर पाये कि कालीन वास्तव में थे या नही। यदि थे तो जनता के कीमती कालीन जिनकी कीमत आज करीब 600 करोड से भी ज्यादा है वे बरामद क्यो नही हुए। और यदि कालीन थे ही नही तो फिर आप अंदाजा लगा ले कि कौन किस लायक है। बीएल सोनी ने अपने पत्ते बिल्कुल सही फेंटे और सरकार बनते ही चील के घोसंले की तरह सही जगह अटक गये। फाईल घुमाने और अंजाम तक पहुचाने में सोनी माहिर माने जाते है और पुलिसिया वीकीलीक बताता है कि पीके सिंह से भी भारी साबित होगे।

पिछले दो महीनों में गहलोत सरकार का बुलबुला बहुत तेजी से बढा है। पर, सांईस के जानकारों का मानना है कि बुलबुले का आकार और उम्र, वातावरण के तापमान पर निर्भर करती है। राजनीतिक तापमान निश्चित रुप से आने वाले दिनो में बढेगा। ऐसे में राजस्थान की जनता को बुलबुले का संतरगी इन्द्रधनुष कितना लुभा पाता है, ये कुछ ही दिनों मे पता चल जायेगा।

अशोक गहलोत ने आम जनता को हमेशा अपनी राजनीति के केन्द्र में रखा है। पर ताजी हवा के अभाव में आशाओं का ये बुलबुला, सचिवालय की संड़ाध मारती, पीक से सनी दिवारों में कब तक जिन्दा रहेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नही।  खास बात ये कि पीने का पानी, सिंचाई के पानी और राजनीतिक पानी के लिए ही कहा गया है – पानी गये ना उबरे, मोती, मानस, चून।

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