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अशोक गहलोत को गियर बदलना होगा !!

बूढे शेरों के जख्मों के निशान ही गवाह होते है कि उन्होने कितनी लड़ाईयां लड़ी और उनका जिंदा होना इस बात का सबूत है कि वे आज तक जीतते आये है। राजनीति में भी जंगल का कानून चलता है। जो समय से साथ बदलता जाता है और ढलता जाता है, वो चलता जाता है। निर्णय नही लेना भी एक तरह का निर्णय है और यथास्थिति बनाये रखने में सुरक्षा महसूस करने वालों को ये समझना होगा कि समय की धारा अनवरत चलती रहती है। शरद पवार ने महाराष्ट्र में हाल ही में ये साबित भी किया है।

बात राजस्थान की हो, तो हाल फिलहाल राजनीति अशोक गहलोत के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है। लॉ मेकर की जिम्मेदारी तो अशोक गहलोत बखूबी निभा रहे है और मॉब लिंचिग और हॉनर किलिंग के खिलाफ कानून ला कर उन्होने ये साबित भी किया। पर, आम जनता के लिए ऐसे कानूनों का कोई मायना नही जब तक बेसिक पोलिसिंग में आमूलचूल सुधार नही होता। सुधार प्रशासनिक हो या पुलिस का, तब तक नही हो सकता जब तक नौकरशाही को लीड़रशिप का डर नही।

राजस्थान में नौकरशाही के धुरंधर पिछले साल तक वसुंधरा राजे के सामने चपरासी की तरह हाजरी लगाया करते थे। पर, वही लोग अब किसी सांमत से कम नजर आते।

सात अलग-अलग जातियों के आईएएस अफसर अशोक गहलोत का कामकाज देखते है। इसके साथ ही पुराने वफादारों को भी अशोक गहलोत ने करीब रखा है। निरंजन आर्य औऱ नवीन महाजन तो इतने पुराने है कि उन्होने तो भंवरी देवी का जमाना भी देखा है। जेल जा चुके पूर्व आईएएस जी एस संधु, जिन पर जगतपुरा शूंटिग रेन्ज से सोफे ले जा कर अपने गुड़गांव के फार्महाउस पर सजाने जैसे आरोप थे, उनकी भी वापसी धीरे धीरे हो रही है। वैसे संधु को पॉवर कॉरिड़ोर में दिल्ली-मुंबई कॉरीड़ोर के किंग कहा जाता है पर फिर भी उन्हे एक मामले में कुछ महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। कुलदीप रांका का ब्यावर की नगरपरिषद से क्या नाता है, ये अभी तक समझ से परे है वही आरती डोगरा अभी तक बीकानेर की मिठास औऱ रुमानियत से बाहर नही आ पायी है।

वैसे तो अशोक गहलोत को जाट विरोधी माना जाता है पर आज की तारीख में पब्लिक डीलिंग और राजनीतिक मैनेजमेन्ट में अगर किसी की चवन्नी चल रही है तो वो है – अमित ढाका। पुराने राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले ढाका ने अभी तक सीएमओं में मोर्चा अच्छे से संभाल रखा है। शशिकांत शर्मा के रुप में गहलोत ने एनएसयूआई से आये एक युवा पर अपना विश्वास जताया है वही लोकेश शर्मा से ज्यादा उम्मीद किसी को नही।

शतरंज बिछा हुआ है, मोहरे भी तैयार है पर कुछ ऐसा है कि खेल शुरु नही हो पा रहा है। सबसे बड़ा कारण ये कि राज्य़ का खजाना खाली है और मोदी जी की उछलकूद की वजह से राज्यों की खीर का प्याला आधा रह गया है। उससे से बड़ा कारण ये कि गहलोत अभी तक ऐसा कोई नया शिगूफा लाने में कामयाब नही हो पाये है जिसे उनका “यूरेका” कह कर प्रचारित किया जा सके। पिछले कार्यकाल में गहलोत की निशुल्क दवा योजना से गरीब को काफी फायदा पहुंचा था। योजनाएं तो अब भी है पर किस बस्ते में बंद है, ये अभी तक पता नही चल पाया है। बड़ी सोलर परियोजनाएं के ज्यादा सफल नही होने के बाद, अब कुसुम योजना के रुप में एक छोटे स्तर का प्रयास फिर से किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि किसान को जमीन का किराया मिलेगा और वह उसी जमीन पर खेती भी कर पायेगा।

ऐसा संभव हो पायेगा और इसका राजनीतिक फायदा मिल पायेगा, ऐसी संभावना कम ही नजर आती है। फिर भी ख्याली पुलाव पकाने में कोई हर्ज नही।

अशोक गहलोत, निश्चित रुप से ऐसे राजनेता है जो आम, गरीब और पिछड़े आदमी को अभी भी अपनी राजनीतिक सोच के केन्द्र में रखते है। सारी भलमनसाहत भरी आशाओं के बावजूद उनके ज्यादातर प्लान का उनको फायदा नही मिल पाता क्योकि वे इस सब प्रयासों को सही तरीके से मार्केट नही कर पाते। उनके साथ समस्या ये कि अफसरशाही अपनी लिमिट में कैद है और राजनीतिक करीबियों के नाम पर गहलोत के पास छुटभइयों की फौज है। सरदार जी के दस करोड के पुराने बिलों के बदले पीआर का फ्री का ठेका इस सारी कवायद में कारगर साबित नही होगा। ऐसे में जरुरी है कि पहले तो जनता के भले के लिए प्रयास किये जाए और उससे भी जरुरी है कि उन्हे जनता तक पहुंचाया जाये।  

गहलोत को गियर बदलना होगा, नही तो सचिन पायलट के पास अब खोने को कुछ है नही। अगर राहुल गांधी फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनते है या किसी भी तरह फिर से पॉवर में आते है तो उनका पहला निशाना गहलोत पर होने की पूरी संभावना है। ऐसे में सचिन पायलट के बराबर में नयी रेखा खींचकर, धीरे धीरे सींचना होगा, चाहे वह संगठन में हो या फिर ऐसे जिले जहां पायलेट ने सामान्तर संगठन को बढावा दिया है।

समय का तकाजा है कि ऐसे कदम जल्दी से जल्दी उठाये जाये जिससे अजमेर में रघु शर्मा के बढ़ते कद की समय समय पर कंटाई-छंटाई और पायलट को राज्य में केवल कबीना मंत्री बनाये रखने के साथ साथ जयपुर औऱ दिल्ली का भी संतुलन बना रहे।

क्या करना है, ये हम बता तो सकते है। पर, अभी ऐसा कोई कारण नही।   

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